शिक्षा के सार्वजनीकरण हेतु सुझाव शिक्षा के सार्वजनिकरण हेतु भारत सरकार द्वारा क्या क्या प्रयास किए जा रहे है ?

शिक्षा के सार्वजनीकरण हेतु सुझाव शिक्षा के सार्वजनिकरण हेतु भारत सरकार द्वारा क्या क्या प्रयास किए जा रहे है ?

शक्ति और क्रियात्मक ज्ञान का विकास ठीक नही होता ।

(5) संकीर्ण आर्थिक नीति – अंग्रेजों ने अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा का भार स्थानीय परिषदों पर डाला था । इसका कारण शिक्षा के व्यय से बचना था । परन्तु हमारी सरकार आज भी उसी नीति का अनुसरण कर रही है । स्थानीय परिषद सदैव आर्थिक तंगी में रहती है । इस कारण वे शिक्षा योजनाओं को ठीक ढंग से पूरा नही कर पाती ।

(6) शिक्षा शासन संबंधी कठिनाई – सरकारी नीति के कारण संस्थाओं में वृद्धि तो हुई परन्तु उनमें गुणात्मक सुधार नहीं लाया जा सका । प्राथमिक शिक्षा का भार आज भी अधिकांशतः, स्थानीय निकायों पर है | जिला परिषद और नगर पालिकाओं पर पड़ा इस शिक्षा का भार प्रत्यक्ष रूप से जनता पर पड़ता है | जनता अन्य करों से दबी हुई मैं इस भार से भी दब जाती है ।

(7) अंग्रेजों की नीति का अभी तक प्रभाव – अंग्रेजों ने अपने व्यापारिक एवं शासकीय | निकायों के लिए बाबुओं को तैयार कराने के हिसाब से भारत में शिक्षा व्यवस्था की थी । उन्हें सभी की शिक्षा की कोई चिन्ता नहीं थी । वह भारत के लोगों को इसलिए शिक्षित नहीं होने देना चाहते थे कि कहीं वो उनके अन्यायों का विरोध न करने लगें । इसलिए उन्होनें शिक्षा के सार्वजनिकरण की अवहेलना की । वर्तमान शिक्षा भी केवल पढ़े-लिखे बेरोजगार लोग तैयार करती है । इसलिए जनता इस शिक्षा
में रूचि नही लेती ।।

(8) राजनैतिक बाधाएँ – आजादी के पश्चात् भारत सरकार ने अपना सारा ध्यान साम्प्रदायिकता, प्रादेशिकता आदि बुराईयों को दबाने में लगाया । शरणार्थियों की समस्या ने भारत का हिला दिया । देशी राज्यों का विलीनीकरण जमींदारी उन्मूलन, भाषा-भाषी राज्यों के बँटवारे, कश्मीर और चीन की समस्यायें, पाकिस्तान के आक्रमण से लोहा लेना आदि कई समस्याओं के कारण भारत सरकार को भारी जन धन की क्षति उठानी पड़ी । ऐसी स्थिति में स्वाभाविक ही था कि भारत – सरकार अनिवार्य शिक्षा की ओर पूर्ण ध्यान नहीं दे सकें ।

(9) नवीन विद्यालय की स्थापना की समस्या – अर्थभाव के कारण प्रत्येक गाँव में नये विद्यालय स्थापित नही किये जा सकते है । विद्यालयों की स्थापना की दृष्टि से मुख्यतः ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यालय भवनों का अभाव है । ग्रामीण लोगों में शिक्षा के प्रति जागरूकता नही होने से वे भवनों की व्यवस्था में भाग नही लेते ।।

(10) अपव्यय अवरोधन की समस्या – घरेलू परिस्थितियों के सही न होने से छात्र अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते । वह या तो फेल हो जाते है या बीच में ही पढना छोड़ देते हे । बालक विद्यालयों की अव्यवस्था और अनाकर्षक वातावरण से आकर्षित नही होते ।

(11) विद्यालय भवनों का अनावर्षक होना एवं उसकी अनुपयुक्तता – विद्यालयों के पास बैठने को फर्श तक नही है तथा न तो इनके पास खेल के मैदान है और न विषयों के शिक्षण हेतु उपयुक्त सहायक-सामग्री रखने की व्यवस्था है । उपयुक्त, स्वास्थवर्द्धक और आकर्षक भवन भी नही है । इनसे बालकों के जीवन पर कोई स्वास्थवर्द्धक प्रभाव नहीं पड़ता ।।

(12) प्राकृतिक एवं भौगोलिक बाँधाएँ – भारत में प्राकृतिक संरचना की दृष्टि से कुछ क्षेत्र बड़े दुर्गम है । नदी-नाले, पहाड, झरने, पठार, जंगल ऐसी प्राकृतिक एवं भौगोलिक बाँधाओं के कारण दो-दो झोपडियों के गाँव बसे है, अतः प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना और बच्चों द्वारा विद्यालयों तक पहुँचना एक भारी समस्या है । ऐसी परिस्थिति में बसे क्षेत्रों में तो शिक्षा का सार्वजनीकरण बिल्कुल नही हो सकता ।।

(13) निर्धनता एवं निरक्षता एक समस्या – निर्धनता से ही निरक्षता का प्रसार होता है । कुछ लोगों को तो भरपेट भोजन नही मिलता । निरक्षता जनता शिक्षा के मूल्य को नही समझती । लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजने की अपेक्षा उन्हें घर के काम धन्धों में लगा देते है । इससे उनकी जीविकोपार्जन की समस्या हल होती है । इसलिए सार्वजनिकरण की योजना पूर्ण नही हो पाती है ।

(14) भाषा की माध्यम की समस्या – भारतवर्ष में एक ही प्रदेश में कदम-कदम पर भाषान्तर मिलता है यहाँ आठ सौ से अधिक भाषाएँ बोली जाती है । अतः समरचा यह है कि बालकों की शिक्षा का माध्यम किस भाषा को बनाया जाये । भारतीय संविधान में 14 भाषाओं को शिक्षा के रूप में स्वीकार किया गया है तथा जो भाषायें बोली जाती है उनकी कोई साहित्य या लिपि उपलब्ध नहीं है । अत: किस भाषा को माध्यम बनाया जाये यह निर्णय करना कठिन लगता है ।।

(15) सामाजिक मान्यताओं की विशेषताएँ – बाल विवाह, अन्ध विश्वास, धर्मान्धता छूआछूत जैसी बुराईयाँ हमारे समाज में व्याप्त है । यद्यपि इन बुराईयों के रोकने के लिए संविधान में व्यवस्था की गई है, परन्तु इन कानूनों का पालन ठीक से नहीं हो पाता क्योंकि भारत की जनता अशिक्षित रही अशिक्षित जनता की सामाजिक कुरीतियों और बुराइयों की जड़ होती है इस पर सामाजिक संहिता अधिक प्रभावी रहती है । बालक कम उम्र में विवाह के कथन में बंध जाते है तो उनकी शिक्षा भी रूक जाती है | लोग सहशिक्षा को भी अच्छा नही समझते । इन सब बातों का कुप्रभाव शिक्षा के सार्वजनीकरण पर पड़ता है ।।

11.6 शिक्षा के सार्वजनीकरण हेतु सुझाव शिक्षा के सार्वजनिकरण हेतु उपाय – भारत विविध सामाजिक आर्थिक परिदृश्य वाला देश है यहां शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने में उपयुक्त कारक व्यवद्यान उपस्थित करते है इन कठिनाइयों को दूर करने के लिए सरकारी प्रयासों की अपेक्षा जन-मानस द्वारा किये जाने वाले प्रयास अधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं । वर्तमान समय में राज्य व केन्द्र सरकार सामूहिक रूप से सर्व शिक्षा अभियान का सूत्रपात किया है ।


शिक्षा के सार्वजनिनीकीकरण हेतु उपाय

  • घर के अनिवार्य विद्यालयों
  • निशुल्क मध्यह
  • कुशल निकट विद्यालय नामांकन में ठहराव
  • सामग्री भोजन
  • शिक्षक

(1) शिक्षा नीति में सुधार – शिक्षा को अनिवार्य बनाने के साथ-साथ उसे बुनियादी रूप देने से खर्चा बहुत बढ़ जाता है यह उचित नही है अत: सर्वप्रथम सरकार शिक्षा को अनिवार्य रूप से विकसित करे, उसका प्रसार करे उसके पश्चात् शिक्षा को बुनियादी बनाने पर खर्च किया जाये । इस प्रकार की शिक्षा नीति से ही शिक्षा का सार्वजनिकरण हो सकेगा ।

(2) प्रशासनिक व्यवस्था में परिवर्तन लाना – प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार लाने के लिए आवश्यक है कि स्थानीय निकायों (नगरपालिका, जिला परिषद आदि) पर ही शिक्षा व्यवस्था का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व न डाला जाये । बल्कि सरकार भी उसमें पूर्ण सहयोग दे । समूचे व्यय-भार और आमदनी को सरकार अपने हाथ में ले ले । तथा सरकारी नीतियों का अनुपालन इन संस्थाओं से कठोरतापूर्वक कराये । ऐसा करने से सार्वभौमिकरण की व्यवस्था अच्छी होगी । नगरपालिका और सभी शिक्षा संकायों के प्रशासनिक अधिकारी समान ही हो जिससे खर्चा कम हो ।

(3) अध्यापकों की व्यवस्था हो । ग्रामीण क्षेत्रों में अध्यापकों और अध्यापिकाओं की

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