विकास के सिद्धान्तों का महत्व दर्शाइए और प्रत्येक सिद्धान्त का वर्णन कीजिये

विकास के सिद्धान्तों का महत्व दर्शाइए और प्रत्येक सिद्धान्त का वर्णन कीजिये

गैसल (Gassel) के अनुसार – “विकास सामान्य प्रयत्न से अधिक महत्व की चीज हैं। विकास का अवलोकन किया जा सकता है एवं मापन भी किया जा सकता हैं इसका मापन तथा मूल्यांकन तीन रूपों में हो सकता हैं –

(1) शरीर निर्माण (Anotomic),

(2) शरीर शास्त्रीय (Physiologic),

(3) व्यावहारिक (Behavioural) व्यवहार 

चूंकि परिवर्तन एक प्रक्रिया है जो हर समय चल रही है । अतः प्रत्येक क्षण विकास भी हो रहा हैं।

हरलॉक (Hurlock) :- “विकास बड़े होने तक ही सीमित नही है । वस्तुतः यह तो व्यवस्थित तथा समानुगत प्रगतिशील क्रम है जो परिपक्वता प्राप्ति में सहायक होता हैं ।” ?

विकास चिन्तन का मूल हैं । यह एक बहुमुखी क्रिया है और इसमें केवल शरीर के अंगों के विकास का ही नहीं बल्कि सामाजिक, सांवेगिक अवस्थाओं में होने वाले परिवर्तनों को भी सम्मिलित किया जाता हैं ।

जेम्स कुंवर (James Drever) :

” विकास वह दशा है जो प्रगतिशील परिवर्तन के रूप में प्राणी में सतत् रूप से व्यक्त होती हैं । यह प्रगतिशील परिवर्तन किसी भी प्राणी में भूणावस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक होता हैं । यह विकास तन्त्र को सामान्य रूप में नियंत्रित करता है । यह प्रगति का मानदण्ड है और इसका प्रारम्भ शून्य से होता हैं ।”

हेनरी सीसल वील्ड
 (i) विकास के कारण और उसकी प्रक्रिया, किसी क्रिया में निहित प्रक्रिया,

(ii) मानव मस्तिष्क से सभ्यता की, प्राणी के जीवन के विकास की अवस्था या विकास की वह प्रक्रिया जो अभिवृद्धि, प्रसार आदि में योग देने की स्थिति में हो

(ii) विकास की प्रक्रिया का परिणाम जो अनेक कारण, दशायें, वर्ग भेद आदि सामाजिक के रूप में प्रकट होते हैं ।

Gessel-“Development is more than a concept. It can be observed appraised and to some extent even measured in three major manifestations-

(i) Anotomic

(ii) physiologic

(iii) Bheavioural…

behaviour signs, however, constitue a most comprehensive index of developmental of developmental status and developmental potentials.

Hurlock-“Development is not limited to growing larger. Instead, it consists of a progressive series of changes towards the goal of maturity. Development results in new characteristics and abilities on the part of individual.”

विकास के सिद्धान्त

व्यक्ति विशेष में विकास की प्रक्रिया के फलस्वरूप होने वाले परिवर्तन कुछ विशेष सिद्धान्तों पर ढ़ले हुए प्रतीत होते हैं । इन सिद्धान्तों को विकास के सिद्धान्त कहा जाता हैं ।
गैरीसन तथा अन्य (Garrison & Others) (P.45) के अनुसार “जब बालक, विकास की एक अवस्था से दूसरी में प्रवेश करता है तब हम उसमें कुछ परिवर्तन देखते हैं । अध्ययनों ने सिद्ध कर दिया है कि ये परिवर्तन निश्चित सिद्धान्तों के अनुसार होते है । इन्ही को विकास के सिद्धान्त कहाँ जाता हैं । ” ये सिद्धान्त निम्नलिखित है :

निरन्तर विकास का सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के अनुसार विकास की प्रक्रिया अविराम गति से निरन्तर चलती रहती है। परन्तु यह गति कभी मन्द या फिर कभी तीव्र हो सकती हैं । जैसे-बालक के जन्म के प्रथम तीन चार वर्ष उसके विकास की प्रक्रिया तीव्र रहती है और उसके बाद मन्द हो जाती है इसी प्रकार मानव शरीर के कुछ भागों का विकास तीव्रगति से और कुछ का मन्द गति से होता है। परन्तु विकास की प्रक्रिया अवश्य चलती रहती हैं ।
स्किनर (Skinner) के शब्दों में – “विकास प्रक्रियाओं की निरन्तरता का सिद्धान्त केवल इस तथ्य पर बल देता है कि शक्ति में कोई आकस्मिक परिवर्तन नही होता हैं ।”

विकास की गति एकसी नही होती । विकास की प्रक्रिया बराबर चलती रहती है, परन्तु इसकी गति सब अवस्थाओं में एक जैसी नही रहती हैं । तथा विभिन्न व्यक्तियों के विकास की गति में भिन्नता पाई जाती है ।

विकास की दिशा का सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के अनुसार बालक का विकास सिर से पैर की दिशा में होता है जैसे बालक अपने जीवन के प्रथम सप्ताह में केवल अपने सिर को उठा पाता हैं । यानि विकास की प्रक्रिया पूर्व निश्चित दिशा में आगे बढ़ती हैं । जैसे
(1) पहले 3 माह में हाथों की गति पर नियंत्रण सीखता ।।

(2) उसके बाद 6 माह में हाथों की गति पर अधिकार करता ।

(3) माह में स्वयं बैठने तथा चलने लगता हैं । इस प्रकार विकास की प्रक्रिया आगे बढ़ती हैं ।

विकास के क्रम का सिद्धान्त –

इस सिद्धान्त के अनुसार बालक का गमक (motor) और भाषा सम्बंधी, आदि विकास एक निश्चित क्रम में होता हैं । शर्ते गेसेले, पियाजे एमिंस (Shirly, Gesel, Piaget, Amis) आदि की परीक्षाओं ने यह बात सिद्ध कर दी है। उदाहरण – जन्म के समय वह केवल रोना जानता हैं । 3 माह में वह गले से विशेष प्रकार की आवाज निकालने लगता हैं । 6 माह में वह किलकारियाँ करने लगता हैं । 8 माह में वह छोटे-छोटे शब्द मा, पा, मम् आदि बोलना सीखता हैं । यानि विकास एक क्रम में होता हैं ।।

एकीकरण का सिद्धान्त .

विकास की प्रक्रिया एकीकरण के सिद्धान्त का पालन करते हुए आगे बढ़ती हैं । इस सिद्धान्त के अनुसार बालक पहले सम्पूर्ण अंग को फिर अंग के भागो का चलाना सीखता हैं । उसके बाद, वह उन भागों में एकीकरण करना सीखता है, उदाहरणार्थ – वह पहले पूरे हाथ को, फिर अंगुलियों को और फिर हाथ एवं उंगलियों को एक साथ चलाना सीखता हैं ।
कुपुस्वामी (Kuppuswamy)  के अनुसार – ” विकास में पूर्ण से अंगों की ओर, एवं अंगों से पूर्ण की ओर गति निहित रहती हैं । विभिन्न अंगों का एकीकरण ही गतियों की सरलता को सम्भव बनाता हैं । “

व्यैक्तिक विभिन्नता का सिद्धान्त –

 इस सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक बालक और बालिका के विकास का अपना स्वयं का स्वरूप होता हैं । विकास के स्वरूप में व्यैक्तिक भिन्नता (Individual differences) पाई जाती हैं । उदाहरण के तौर पर एक बालक और एक बालिका या फिर एक ही आयु के दो बालकों, दो बालिकाओं के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक आदि विकास में व्यैतिक भिन्नताओं की उपस्थिति स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती हैं ।
स्किनर (Skinner) ने कहा है- “विकास के स्वरूपों में व्यापक व्यैक्तिक विभिन्नताएँ होती हैं । “

 परस्पर सम्बंध का सिद्धान्त –

विकास की सभी दिशाएँ – शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक आदि – एक दूसरे से परस्पर सम्बंधित हैं । इनमें से किसी भी एक दिशा में होने वाला विकास अन्य सभी दिशाओं में होने वाले विकास को पूरी तरह प्रभावित करने की क्षमता रखता हैं । जब बालक का शारीरिक विकास के साथ-साथ उसकी रूचियों, ध्यान के केन्द्रीयकरण और व्यवहार में परिवर्तन होते हैं । साथ-साथ उसमें गामक और भाषा सम्बंधी विकास भी होता हैं ।

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