भविष्य शिक्षा के आधारभूत सिद्धान्त कौन कौन से है, सभी का संक्षिप्त वर्णन कीजिये ?

भविष्य शिक्षा के आधारभूत सिद्धान्त कौन कौन से है, सभी का संक्षिप्त वर्णन कीजिये ?

भविष्य तथा शिक्षा इनका आपस में घनिष्ठ संबंध है । भारतीय शिक्षा आयोग (196466) के द्वारा शिक्षा के संरचनात्मक परिवर्तन 10+2+3 में समरूपता से पालन करने की सिफारिश की गई थी । इन्होंने शिक्षा को लचकदार समयानुसार कम अवधि व भविष्योन्मुखी ढांचे में डाला क्योंकि वर्तमान ढांचे के कोई विशेष उपयोगी परिणाम हमारे सामने नही आये हैं । बल्कि स्नातक स्तर पर एक साल अवधि बढ़ी है, जिसका योग्यता की दृष्टि से छात्र-छात्राओं को कोई लाभ नहीं मिला है । इसके साथ-साथ स्नातकोतर पद्धति में भी परिवर्तन किया जा सकता है । लेकिन जो भी परिवर्तन किया जाये बडी सुझ-बूझ के साथ किया जाना चाहिये । परिवर्तन केवल परिवर्तन के लिये न होकर राष्ट्र प्रगति के हित में हो, विकसोन्मुखी और भविष्योन्मुखी हो ।

 शिक्षा की भविष्यमिति का अर्थ
शिक्षा की भविष्यमिति का अर्थ है वर्तमान सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक तथा वैज्ञानिक परिस्थितियों का अध्ययन कर उनके आधार पर भविष्य में हमारे सामने आने वाली समस्याओं व चुनौतियों का पूर्वानुमान लगाना जिससे इनका सामना करने के लिये शैक्षिक योजना पहले से ही तैयार की जा सके । इसके द्वारा भावी समाज के स्वरूप का पूर्वानुमान लगाते हैं और उसके अनुरूप भविष्य के सम्भावित शैक्षिक परिवर्तनों की रूपरेखा तैयार करते हैं।

 भविष्य शास्त्र के क्षेत्र

आज जीवन मूल्यों पर घोर संकट है | आज मानव तनाव, असामंजस्य तथा विरोध का स्रोत बन गया है और स्वयं ही अपने अस्तित्व के लिये खतरा बन गया हैं । इन कष्टों से जूझने के लिये न्यायपूर्ण और सौहार्दपूर्ण प्रशिक्षित मस्तिष्क की आवश्यकता है । यह वातावरण भविष्य विज्ञान के द्वारा ही प्राप्त की जा सकता है । भविष्य विज्ञान बालक को नवीन व व्यवस्थित जीवन जीने की कला सिखाता है, जिसके द्वारा मनुष्य नव-निर्माण का कार्य कर सकता है ।
1. विविध समस्याओं का वैधानिक विधि से अध्ययन ।

2. स्वयं के अस्तित्व का ज्ञान ।

3. भविष्य की तैयारी का अध्ययन ।

4. वैयक्तिक व सामूहिक जीवन के लिये तैयारी ।।
5. मनुष्य के मूलभूत गुणों की पहचान में सहायक ।

भविष्य शास्त्र की आवश्यकता व महत्व

इसकी आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से अनुभव की जा रही है –
1. समय व साधनों के उचित उपयोग के लिये
जब किसी समस्या के उपस्थित होने के बाद हम उसके समाधान, उपायों के विशय में विचार करना आरम्भ करते है तो इस सम्बन्ध में योजना तैयार करने में समय लग जाता है । भविष्यमिति द्वारा भावी समस्याएं का पूर्वानुमान लगा कर उनके समाधान के लिये शैक्षिक कार्य योजना पहले ही तैयार कर ली जाती है ।

2. इच्छित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये शिक्षा राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति का साधन है । भविष्य विज्ञान के द्वारा हम यह निर्धारित करते है कि भविष्य में हमारे लिये क्या इच्छित है और क्या नहीं । जो इच्छित है। उसे प्राप्त करने के लिये शैक्षिक कार्यक्रम तैयार किये जा सकते है । |

3. उच्च प्रशिक्षित जनशक्ति के निर्माण के लिये भविष्य विज्ञान के द्वारा ही हम वर्तमान विज्ञान व तकनीकी के क्षेत्र में हो रहे परिवर्तनों के आधार पर भविष्य के लिये कुशल जनशक्ति के निर्माण की योजना तैयार कर सकते हैं ।

4. भविष्य की जटिल समस्याओं वे; समाधान के लिये शिक्षा की भविष्यमिति के द्वारा इनका पूर्वानुमान लगा इनके समाधान के लिये भावी शिक्षा की कार्य योजना तैयार की जा सकती है  |

5. भविष्य को अपने अनुकूल बनाने के लिये । प्रत्येक समाज सामान्यतः अपने अतीत पर गर्व करता है और भविष्य के लिये सुन्दर सपने बनाता है । उसके इन सपनों को साकार करने में शिक्षा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है । शैक्षिक भविष्यमिति के द्वारा अपने सपनों को साकार रूप देने के लिये शैक्षिक कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की जाती है ।

6. भावी शैक्षिक नियोजन के लिये बदलते सामाजिक परिवेश एवं आवश्यकताओं के अनुरूप इसके उद्देश्य तथा उनकी प्राप्ति के लिये दिये जाने वाले अधिगम अनुभवों की व्यवस्था की जाती है ।

7. भविष्य की अनजान परिस्थितियों से सामंजस्य करने के लिये भविष्य की शिक्षा छात्रों में भविष्य की उन अनजान परिस्थितियों से सामंजस्य की क्षमता विकसित करती है तथा उसके व्यक्तित्व को गतिशील बनाती है । भविष्य शिक्षा में सामग्री एकत्रीकरण, विश्लेषण, ग्रहण करने कई, सीखने व पूनः सीखने की कुशलता का विकास किया जाता है ।

8. भविष्य को मापने की क्षमता का विकास टौफलर का मानना है कि भविष्य की शिक्षा छात्रों में भविष्य के स्वरूप मापने की क्षमता का विकास करती है अर्थात् वह सिखाती है कि भविष्य का स्वरूप वर्तमान से कितना अधिक होगा तथा किसी सीमा तक आगे जा सकता है ।

9. लोकतान्त्रिक तरीकों पर बल भविष्य की शिक्षा पद्धति की विधियों में लोकतान्त्रिकता होनी चाहिये । भविष्य विज्ञान के माध्यम से लोकतान्त्रिक तत्वों को प्रखरता प्रदान की जती है । भविष्य के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने का महत्व भविष्य चेतना कैसे विकसित करें? भविष्य चेतना उत्पन्न करने में शिक्षा की भूमिका

भविष्य शिक्षा के आधारभूत सिद्धान्त

70 के दशक व उसके आस-पास अनेक ऐसे ग्रन्थों की रचना हुई जिन्होंने शैक्षिक भविष्यमिति के उद्भव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । इनमें 11072 में UNISCO की ‘Learning to Be’ इवान इलियच (Ivan IIliach) की “Deschooling Society ” रेमर (Reimer) की “School is dead” तथा टौरस्टन (Torsten) की Education in the year 2000′ आदि ग्रंथ उल्लेखनीय है । इसी प्रकार शैक्षिक विकास पर अन्तर्राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट में आने वाले समय में, ‘सीखने के लिये सीखना (Learning for sake of) शिक्षा का उद्देश्य बताया गया है । ये विचार अमेरिका के शैक्षिक विकास पद्धति पर आधारित है ।।
1. जीवन पर्यन्त शिक्षा का महत्व व शिक्षा में समानता को स्थान ।।

2. शिक्षा में परीक्षण को स्थान, साथ ही ये परीक्षण असफलता को राहने व धैर्य की जांच में भी सहायक होंगे।

3. तकनीकी का शिक्षा में महत्व बढ़ेगा ।।

4. शिक्षा में गुणात्मकता व समानता दोनों की प्राप्ति सम्भव ।

5. अधिगम व शिक्षण समस्याओं के प्रति उदार दृष्टिकोण ।

6. अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के लक्ष्य के लिये प्रयास ।

7. व्यावसायीकरण पर बल ।

8. सैद्धान्तिक विषयों के साथ-साथ नैतिक विकास पर जोर ।

9. उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नई-नई शाखाओं को महत्व ।।

10. सृजनात्मकता उन्मुख अधिगम पर जोर ।

11. जीवन मूल्य व जीवन कौशल आधारित शिक्षा पर बल ।।


भविष्य के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने का महत्व टौफलर ने अपनी पुस्तक “F”Futureuture Shock” Shock” में बहुत विस्तार तथा संतोषजनक ढंग से बतलाया है कि मानव जाति के लिए भविष्य के प्रति संवेदनशील (Sensitivesensitive) होना अत्यन्त आवश्यक हो गया है ।

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