1854 के शिक्षा के “आदेश-पत्र” की मुख्य सिफारिशें क्या थी?

1854 के शिक्षा के “आदेश-पत्र” की मुख्य सिफारिशें क्या थी?

अत: छात्रों का उद्देश्य केवल परीक्षा उत्तीर्ण करना रहा न की ज्ञान अर्जन करना ।

11. “आदेश-पत्र’ में शिक्षा संस्थानों को अनुदान देने की बात कही गई लेकिन अनुदान उसे ही दिया जाता था जो आधा व्यय वहन करें । इसमें अंग्रेजी शिक्षा देने वालों को तो यह अनुदान मिलता रहा लेकिन ऐसी शिक्षा संस्थाओं को नहीं मिल पाता था जो शिक्षा भाषा अनेक माध्यम से देते थे ।

12. “घोषणा-पत्र- के माध्यम से व्यावसायिक शिक्षा संस्थानों की स्थापना तो हुई लेकिन इससे भारतीयों का कोई विशेष हित नहीं हुआ । क्योंकि इसका उद्देश्य भारतीयों को
नौकरी देकर राजनिष्ठ बनाना था । 

वुड के घोषणा पत्र की सार्थकता 

भारतीय शिक्षा के इतिहास में वुड का “घोषणा-पत्र’ बेजोड़ है । इसके भारतीय शिक्षा की बहुरूपता का अन्त करके उसे एक रूपता प्रदान की । विश्वविद्यालयों की नींव पड़ी, सहायता अनुदान प्रणाली, जन शिक्षा विभाग की स्थापना, छात्रवृत्तियाँ, शिक्षा पर अधिक धन व्यय करने के बावजूद भी घोषणा पत्र को महाधिकार पत्र कहना युक्ति संगत नहीं जान पड़ता । इसका दिग्दर्शन निम्न अनुकूल व प्रतिकुल सम्मतियों में किया जा सकता है – एस. एन. मुखर्जी “आज्ञा पत्र वास्तव में बहुत ही मूल्यवान घोषणा पत्र है ।” जेम्स “यह भारतीय शिक्षा का महा घोषणा-पत्र है ।” डलहौजी “समस्त भारत में शिक्षा इतनी अधिक फैली कि शिक्षा की इतनी विस्तृत योजना स्थानीय सरकार कभी भी निर्धारित करने का साहस नहीं कर सकती थी । ” इस प्रकार 1854 के घोषणा पत्र की निम्न विशेषतायें थी –
1. यह सघन योजना थी ।

2. यह अधिकारिक घोषणा-पत्र था ।

3. ऐतिहासिक घोषणा-पत्र ने शिक्षा को क्रमबद्धता प्रदान की ।

4. वर्तमान शिक्षा के लिए नींव का पत्थर बन गया ।
उपरोक्त विशेषताओं के बावजूद “घोषणा-पत्र” के पीछे कम्पनी के अपने लाभ और स्वार्थ की भावना काम कर रही थी । जो कि निम्न तथ्यों में देखने को मिलता है :
। नायक तथा नरूला के अनुसार “महाधिकार-पत्र” ने भारत को ब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चे माल की पूर्ति करने वाला ही समझा ।।
एस. एन. मुखर्जी “हमें उन अतिशयोक्ति पूर्ण शब्दों में जिनमें कुछ इतिहासकारों ने आदेश-पत्र का वर्णन किया है और इसे भारतीय-शिक्षा का महाधिकार-पत्र बताया है, का कोई औचित्य नहीं मिलता।
प्रांजपे “सन् 1854 में आदेश-पत्र का चाहे जो भी महत्व हो, पर इस समय उसको शिक्षा का अधिकार-पत्र कहना -हास्यास्पद होगा ।”

 सारांश 

। सन् 1854 में वुड के घोषणा-पत्र में तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था के पुनरीक्षण तथा भावी शैक्षिक पुनर्निर्माण के लिए नीति को प्रस्तुत किया गया जिसमें जनसाधारण के लिए शिक्षा व्यवस्था करने के साथ-साथ ब्रिटिश शासकों की आवश्यकता को भी ध्यान में रखा गया । लेकिन यह घोषणा-पत्र भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए आगे चलकर एक मील का पत्थर बना और शासन व्यवस्था कम्पनी के स्थान पर ब्रिटिश संसद के हाथों में आ गई ।

7.7 मूल्यांकन प्रश्न
1. 1854 के शिक्षा के “आदेश-पत्र” की मुख्य सिफारिशें क्या थी?

2. आधुनिक भारतीय शिक्षा के इतिहास में इस आदेश पत्र के स्थान का समीक्षात्मक
मूल्यांकन कीजिए? 3. “वुड का घोषणा-पत्र” शिक्षा का महाधिकार-पत्र कहलाता है । विवेचना कीजिए ।

4. वुड के घोषणा-पत्र की कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशें बताइए, जो आधुनिक भारत में शिक्षा के लिए लाभदायक सिद्ध हो सकती है ।

संदर्भ ग्रन्थ

1. अग्निहोत्री रविन्द्र (2006)- आधुनिक भारतीय शिक्षा की समस्याएँ और समाधान जयपुर : राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी ।

2. अग्रवाल जे.सी. (1993)- लैंडमार्स इन द हिस्ट्री ऑफ मॉडर्न इण्डियन एज्यूकेशन, नई दिल्ली वाणी बुक्स ।

3. अदावल एस.बी. तथा एम. उनियाल (1982)- भारतीय शिक्षा की समस्याएँ तथा प्रवृत्तियाँ लखनऊ, उत्तर प्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी ।।

4. चौबे, सरयु प्रसाद (1975)- भारत में शिक्षा का विकास इलाहाबाद सेन्ट्रल बुक डिपो ।

5. गुप्ता एस.पी. : गुप्ता अलका (2008) -: भारतीय शिक्षा का इतिहास, विकास एवं समस्यायें इलाहाबादः शारदा पुस्तक भवन

6. नायक, जे.पी. तथा सैयद नरूला (1976) -: भारतीय शिक्षा का इतिहास, दिल्ली : मैकमिलन एण्ड कम्पनी ।

7. पाठक.पी.डी (1996)- भारतीय शिक्षा और उसकी समस्याएँ, आगरा: विनोद पुस्तक मन्दिर ।

8. पाठक पी.डी. तथा जौहरी. बी.पी. (1995)- भारतीय शिक्षा का इतिहास, आगरा: विनोद पुस्तक मन्दिर ।।

9. सिंघल, महेश चन्द्र (1971)- भारतीय शिक्षा की वर्तमान समस्यायें जयपुर. राजस्थान, हिन्दी ग्रन्थ अकादमी ।

10. श्रीमाली, के.एल. (1961)- प्राब्लम्स ऑफ ऐज्यूकेशन इन इण्डिया, नई दिल्ली : पब्लिकेशन डिवीजन ।

11. कपूर, उर्मिला (2002)- भारतीय शिक्षा का इतिहास और समस्याएँ, आगरा : साहित्य प्रकाशन |

इकाई 8 हण्टर कमीशन 1882

(Hunter Commission 1882) इकाई की संरचना 8.0 उद्देश्य 8.1 ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि 8.2 आयोग की नियुक्ति 8.3 आयोग का कार्यक्षेत्र एवं उद्देश्य 8.4 प्राथमिक शिक्षा 8.5 माध्यमिक शिक्षा 8.6 उच्च शिक्षा 8.7 शिक्षा का भारतीयकरण 8.8 धार्मिक शिक्षा 8.9 स्त्री शिक्षा 8.10 पिछड़े वर्गों की शिक्षा 8.11 आदिवासी एवं पर्वतीय जातियों की शिक्षा 8.12 सारांश 8.13 संदर्भ ग्रंथ 8.0 उद्देश्य
इस इकाई के अध्ययन के पश्चात् आप – • हण्टर आयोग की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि समझ सकेंगे । • प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के सम्बन्ध में आयोग द्वारा दी गई सिफारिशों को समझ सकेंगे । माध्यमिक शिक्षा के लिए आयोग द्वारा दी गई सिफारिशों का विश्लेषण कर सकेंगे । उच्च शिक्षा के सम्बन्ध में आयोग द्वारा की गई सिफारिशों का मूल्यांकन कर सकेंगे ।
भारतीयकरण के संदर्भ में आयोग द्वारा दिये गये सुझावों की व्याख्या कर सकेंगे. । • धार्मिक शिक्षा के संबंध में आयोग के विचार को जान सकेंगे । | पिछड़े वर्गों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए आयोग द्वारा दी गई सिफारिशों से अवगत हो सकेंगे। आदिवासी एवं पर्वतीय जातियों के विकास के लिये आयोग द्वारा दी गई सिफारिशों के योगदान पर विचार विमर्श कर सकेंगें ।

 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

वुइ के घोषणा पत्र के परिणामस्वरूप 1857में उच्च शिक्षा प्रदान करने के लिए कलकत्ता, बम्बई एवं मद्रास में विश्वविद्यालय खोले गये । इन तीनों विश्वविद्यालयों का गठन लंदन विश्वविद्यालय को आदर्श मानकर किया गया । उस समय लंदन विश्वविद्यालय केवल परीक्षा लेने का कार्य करता था । अत: इन तीनों विश्वविद्यालयों का कार्य भी इसी क्षेत्र तक सीमित रहा । ये विश्वविद्यालय किराये के भवनों में स्थित थे और शिक्षण कार्य से कोई प्रयोजन नहीं रखते | ये विश्वविद्यालय अपने अधिकार क्षेत्रों में स्थित कॉलेजों को सम्बद्धता (Affiliation) प्रदान करते थे और उनमें अध्ययन करने वाले छात्रों की परीक्षा लेते थे । इस समय कॉलेजों में निरन्तर वृद्धि होने के कारण यह अनुभव किया गया कि भारत में उच्च शिक्षा पर बहुत अधिक व्यय किया जा रहा है लेकिन प्राथमिक शिक्षा की उपेक्षा की गई है । वुड के घोषणा पत्र में उदारतापूर्ण अनुदान देने की नीति को सरकार द्वारा नहीं अपनाया गया । जिस मिशनरियों को गहरा आघात पहुँचा । क्योंकि अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय एवं महाविद्यालय इन्हीं के द्वारा संचालित थे ।

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