राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग और संरक्षण

राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग और संरक्षण

आज का विद्यार्थी कल राजनैतिक, प्रशासनिक, सामाजिक क्षेत्र में नेतृत्व करता है । अत: नेतृत्व के गुणों का विकास शिक्षा द्वारा किया जाना चाहिए जिसमें परिश्रम, सहनशीलता, अनुशासन, त्याग, सामाजिक-समझदारी तथा राष्ट्रीय अवबोध का प्रशिक्षण बालक के विद्यालय स्तर पर दिया जाना चाहिए । किन्हीं कारणों से देश को स्वस्थ नेतृत्व प्राप्त नहीं हो रहा है । जिससे राजनैतिक, प्रशासनिक चरित्र दूषित हो गया है, कई बार तो ऐसा लगता है कि जिन लोगों के जेल की दीवारों में कैद होना चाहिए वह राष्ट्र के निर्धारक बन गये है | परिणाम सामने है | स्वेच्छाचारी, और दुर्बल नेतृत्व का प्रभाव है कि आज राष्ट्र एक साथ अनेकों समस्याओं से जूझ रहा है । अत: शिक्षा द्वारा योग्य सत्यनिष्ठ, कर्मठ नेतृत्व को जन्म देना लोकतंत्रीय जीवन के लिए संजीवनी जैसा होगा, जिसे शिक्षा को अपना प्रमुख उद्देश्य स्वीकार करना चाहिए ।

राष्ट्रीय जीवन में शुचिता का विकास

भारत के लोकतांत्रिक गणराज्य के समक्ष न तो संसाधनों की समस्या है, न ही उच्च योग्यता की कमी है न ही अवसरों की कमी है, वर्तमान में यदि कमी है तो आचरण में शुचिता और अनुशासन की, कर्तव्य परायणता की । हमारी सारी अच्छाइयाँ, सिर्फ एक कमी के कारण पथ से भटक जाती है । देश की कोई भी योजना अपने निर्धारित लक्ष्यों तक नहीं पहुंच पाती । अव्यवस्था उत्पन्न कर स्वयं का फायदा उठाने वाले लोगों पर नियंत्रण नहीं कर पाना हमारे समाज की सबसे बड़ी समस्या है जो हमारे जन-गण को धीरे-धीरे खोखला कर रही है । अत: आवश्यकता है ऐसी व्यवस्था के निर्माण की जिसमें चारित्रिक शुचिता को स्थापित विकसित किया जा सके । शिक्षा द्वारा राष्ट्रीय मूल्यों की स्थापना अपरोक्ष साधनों द्वारा की जा रही है।
प्रत्यक्ष साधनों द्वारा जैसे व्यावसायिक कुशलता की स्थापना का उद्देश्य शिक्षा जगत का अनिवार्य लक्ष्य होना चाहिए | क्योंकि जिस देश में नागरिक बड़ो का आदर नहीं करते, जो सत्य नहीं कहते, न्याय को न्याय नहीं समझते तथा जो चोर बाजारी और घूस लेने से धन कमाने में अपना अपमान नहीं समझते उस देश का पतन होना निश्चित है । यदि किसी देश को उन्नति के शिखर पर चढ़ना है तो उसके नागरिकों को चरित्रवान बनना परम आवश्यक है ।।

राष्ट्रीय चेतना का विकास

राष्ट्रीय चेतना राष्ट्र को जीवनता प्रदान करती है जब किसी देश के नागरिक अपने जीवन की प्रत्येक गतिविधि को राष्ट्रोन्मुखी का राष्ट्रीय हितों का पोषण करते है तब उनके व्यवहार में राष्ट्रीय चेतना का दर्शन होता है । संसाधनों के दोहन करते हुये कार्य स्थल पर कार्य करते समय, यात्रा करते समय, कचरा व मल निस्तारण करते समय यदि नागरिकों में राष्ट्रीय चेतना नहीं होती तो उनके द्वारा विभिन्न अर्थों में किये गये कार्य व्यक्तिगत हित के लिए होते है जो राष्ट्र के विकास में बाधक सिद्ध होते हैं । भारतीय जीवन में संसाधनों के दोहन व उपयोग के समय, यात्रा के समय कचरा व मल निस्तारण के समय राष्ट्रीय चेतना दृष्टव्य नहीं होती । इसीलिए वन्य सम्पदा विनष्ट हो रही हैं पर्यावरण विषैला हो रहा है । कार्य स्थल में राष्ट्रीय चेतना की कमी के कारण आतंककारी व विघटनकारी शक्तियां प्रभावी हो रही हैं। शिक्षा के विभिन्न अंगों दवारा राष्ट्रीय चेतना के विकास हेतु प्रयत्न कर राष्ट्रीय निष्ठा को व्यावहारिक धरातल दिया जाना चाहिए | जो वर्तमान भारत राष्ट्र की सर्वोत्तम आकांक्षा है । इसे शिक्षा मान्य लक्ष्य ग्रहण किया जाना चाहिए ।

राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग और संरक्षण

प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और संरक्षण में विकासशील देश पिछड़े हुए हैं भारत की यह जटिल समस्या है संसाधनों के दोहन के नाम पर प्रकृति के साथ अनाचार भावी पीढियों के लिए विकट समस्या उत्पन्न करेगा । जैसे जंगलों की कटान, पानी का दोहन खदानों द्वारा भूमि को खोखला किया जाना । ये वे बिन्दु है जिनसे आज की पीढी तो आनंदमग्न है, बहु लता में उसका दुरूपयोग कर रही हैं । लेकिन जब संसाधन समाप्त हो जायेगे तो भावी पीढ़ी के लिए जीवन निर्वाह असंभव हो जायेगा । इसके लिए संसाधनों के संरक्षण के साथ दोहन को प्रेरित व प्रशिक्षित किया जाना आवश्यक है जिसकी प्राप्ति शिक्षा दवारा ही संभव है ।।

जनसंख्या नियंत्रण व मानव संसाधन का नियोजन

जन विस्फोट विश्व की विकासमान अर्थ व्यवस्थाओं की राष्ट्रीय समस्या है । असीमित जनवृद्धि राष्ट्रीय नकरात्मक विकास को प्रेरित करती है, संसाधनों के अधिग्रहण में संघर्ष की स्थिति बनने से राष्ट्र का पराभव हो जाता हैं अत: शिक्षा के विभिन्न आयामों द्वारा ‘जनसंख्या नियंत्रण – हेतु संचेतना का विकास किया जाना चाहिए । साथ ही उपलब्ध जनशक्ति को इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाय कि राष्ट्रीय निर्माण में उनकी समुचित भागीदारी सुनिश्चित हो सके।

पर्यावरण संचेतना का विकास

| राष्ट्र अपने पर्यावरण में ही विकसित होता है यदि विकास के नाम पर जल, थल, वायु तभी को प्रदूषित कर दिया जायेगा तो राष्ट्रीय जीवन रोग ग्रस्त होकर पीडित होगा । अत: विकास के पर्यावरण प्रेमी मॉडलों पर ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए, संचार और ऊर्जा के पाश्चात्य मॉडल वर्तमान पर्यावरण के लिए विषवृक्ष बन गये है यदि इन पर ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में राष्ट्रीय जीवन पंगु हो जायेगा । अत: प्रत्येक व्यक्ति में पर्यावरण चेतना का विकास करना होगा । प्रकृति के साथ सहचर्य के सिद्धान्त के व्यवहार रूप में शिक्षा द्वारा है। परिणत किया जा सकता हैं अत: राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा द्वारा पर्यावरणीय संचेतना का विकास एक अनिवार्य उद्देश्य के रूप में होना चाहिए । 

समान आर्थिक विकास

भारत आज विकसित अर्थव्यवस्था में प्रवेश कर चुका है परन्तु असमान आर्थिक विकास जो नियोजन की कमियों का परिणाम हैं । गरीबी और बेरोजगारी की समस्या से ग्रस्त है देश की मजबूत अर्थव्यवस्था में भुखमरी बेरोजगारी एक जटिल समस्या है क्योंकि औपनिवेशिक, शिक्षा प्रणाली में आमजन के होने में बी.ए., एम.ए. की साधारण शिक्षा आती है वह स्नातक व परास्नातक बेरोजगार कहा जाता है इसके निवारण के लिए शिक्षा में जो भी सुधार किये गये वे सिर्फ पेबन्द के रूप में हैं सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली औपनिवेशिक और अभिजात्य स्वरूप को बदलने का प्रयत्न अभी तक नहीं किया गया । लेकिन लोकतांत्रिक देश होने के कारण बेरोजगारी और गरीबी की विकट समस्या का समाधान शिक्षा के माध्यम से ही तलाशना होगा । शिक्षा के विभिन्न अंगों द्वारा इस समस्या के समाधान का प्रयास इसे अपना प्रमुख उद्देश्य बना कर करना पड़ेगा ।

शिक्षा के राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति में बाधक तत्व

समग्र रूप में शिक्षा वह प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति का संस्कार होता है । समाज और राष्ट्र के अनुकूल उसके व्यवहारों में परिमार्जन होता है, जो शिक्षा द्वारा ही किया जाता है । परन्तु भारतीय सन्दर्भ में देखे तो शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति का प्रतिशत बहुत न्यून है इसके कई कारण है जिनका सांगोपांग अध्ययन करना उद्देश्यों के साथ आवश्यक है ।

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