भारत मे राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की जरूरत क्यों है, और इसकी स्थापना कब की गयी?

भारत मे राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की जरूरत क्यों है, और इसकी स्थापना कब की गयी?

शिक्षा के अधिकार से सम्बन्धित वैधानिक प्रावधानों का उल्लेख कर सकेंगे । शिक्षा के अधिकार की वर्तमान स्थिति का विश्लेषण कर सकेंगे । शिक्षा के अधिकार के भावी प्रभावों का अनुमान लगा सकेंगे । शिक्षा को अधिकार की क्रियान्विति में केन्द्र व राज्य सरकार की भूमिका का विवेचन की सकेंगे ।

• शिक्षा के अधिकार से होने वाले सामाजिक, आर्थिक परिवर्तनों की व्याख्या कर सकेंगे ।

• शिक्षा को अधिकार हेतु जागरूकता के विकास में सकारात्मक योगदान दे सकेंगे ।

• शिक्षा के अधिकार हेतु विभिन्न विचारधाराओं का विश्लेषण कर सकेंगे ।
• शिक्षा के अधिकार के विभिन्न आयामों की विशेषताओं का शिक्षा में महत्व बता सकेंगे।

प्रस्तावना

21वीं सदी अपने साथ अनेक चुनौतियाँ लेकर आई । तीव्रता से हो रहे भौतिक, तकनीकी, वैज्ञानिक विकास, सामाजिक – आर्थिक परिवर्तन एक नवीन परिदृश्य उत्पन्न कर रहे हैं । विश्व के सभी राष्ट्र इन चुनौतियों का सामना अपनी परिस्थिति, संसाधन, शक्ति एवं सामर्थ्य के अनुसार कर रहे हैं । संसाधनों पर निर्भरता सदैव से रही है किन्तु कुछ दशक पहले तक प्राकृतिक संसाधन ही महत्वपूर्ण थे । वर्तमान में प्राकृतिक के साथ-साथ मानवीय संसाधन किसी भी राष्ट्र की भूमिका निश्चित करने में महत्वपूर्ण योगदान करते हैं । तीव्र वैश्विक विकास हेतु राष्ट्रों के बीच प्रतियोगिता छिड़ी हुई है । ऐसे में ज्ञान को सर्वाधिक प्रेरक बल के रूप में सर्वमान्य रूप से स्वीकार कर लिया गया है । वैश्विक स्तर पर यह माना जा रहा है कि आगामी वर्षा में विकास की रूपरेखा व राष्ट्रों की भूमिका निश्चित करने का कार्य ज्ञान तय करेगा | वैश्विक स्तर पर एक प्रतियोगी खिलाड़ी के रूप में उभरने की भारत की क्षमता अधिकांशत: ज्ञान संसाधनों पर ही निर्भर करेगी । पीढ़ी गत बदलाव को प्रोत्साहित करने के लिये एक ऐसा व्यवस्थागत बदलाव जरूरी है जो समूचे ज्ञान क्षेत्र की समस्याओं की ओर ध्यान दे सकें । ज्ञान के विस्फोट, सूचना क्रांति, ज्ञान की गुणवत्ता, ज्ञान की सुलभता व रचनात्मक ज्ञान को ज्ञान संसाधनों के रूप में विकसित कर सकें | भारत जैसे विशाल व विविधतापूर्ण राष्ट्र में ज्ञान के क्षेत्र में सुधार व ज्ञान को एक संसाधन के रूप में विकास करने के लिये एक सुदृढ़ प्रयास व कार्यकारी योजना की आवश्यकता है । ज्ञान की ऐसी क्रांति हो जो क्षमता निर्माण करने और गुणवत्ता पैदा करने में सक्षम हो । इसलिए राष्ट्रीय ज्ञान आयोग का गठन किया गया ।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है किन्तु जनसंख्या विस्फोट, संसाधनों व अवसरों की कमी व शिक्षा के प्रति जागरूकता की कमी के कारण भारत के प्रत्येक नागरिक को शिक्षित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य बन गया, इसलिए भारत में शिक्षा के अधिकार की मांग लम्बे समय से उठ रही थी । राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने भी ज्ञान के बढ़ते महत्व को देखते हुए शिक्षा के अधिकार की पुरजोर सिफारिश की । स्वतंत्रता के साठवें दशक में भारत सरकार ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 को मौलिक अधिकार का दर्जा दे दिया । अब देश के प्रत्येक 6 से 14 वर्ष तक के बच्चे को अनिवार्य व निःशुल्क प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त है । निश्चित रूप से भारत जैसे लोकतांत्रिक देश व समाज के सशक्तिकरण एवं उत्थान के लिये शिक्षा का अधिकार मील का पत्थर साबित होगा।

इस इकाई में राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के गठन की परिकल्पना, उद्देश्य, क्षेत्र, विचारार्थ विषय एनकेसी के प्रभाव, केन्द्र व राज्य सरकारों के साथ उन का सम्पर्क व पहल एवं शिक्षा के अधिकार सम्बन्धी विभिन्न आयामों को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है ।

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की परिकल्पना

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की परिकल्पना राष्ट्रीय विकास परिषद् द्वारा अपनाई गई 11 वीं पंचवर्षीय योजना में परिलक्षित होती है । यह योजना विस्तार उत्कृष्टता और साम्यता पर विशिष्ट बल देते हुए त्वरित व समावेशी उन्नति के लिये केन्द्रीय साधन के रूप में शिक्षा को उच्च प्राथमिकता देती है । दसवीं में शिक्षा का हिस्सा 7 से बढ़कर 20% तक पहुँच जायेगा जो कि जी.डी.पी. के 6% के लक्ष्य की दिशा में एक विश्वसनीय प्रगति का परिचायक होगा । सरकारी नियोजन के इतिहास में यह एक ऐतिहासिक पहल है । इस दृष्टि से प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की ज्ञान आयोग की परिकल्पना निश्चित रूप से प्रशंसनीय है | यह इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि हमारे ज्ञानाधार के विशाल भण्डार का लाभ उठाने के निमित्त एक कार्य योजना तैयार करने के प्रयोजन करवाना ज्ञान आयोग की परिकल्पना की गई जिससे कि भारत 21 वीं शताब्दी की चुनौतियों का सामना आत्म विश्वास करवाना कर सकें । यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य है । इसके लिये संसाधनों व समय के साथ-साथ एक साहसपूर्ण कल्पना और तीव्र कार्यान्वयन के आधार पर भी बल दिया जाना आवश्यक होगा । इसलिए साहसपूर्ण परिकल्पना की क्रियान्विति राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के गठन के रूप में की गई ।

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के उद्देश्य

1. विश्व में हो रहे ज्ञान के विस्फोट को देखते हुए भारत में ज्ञान की संभावनाओं का पता लगाना ।

2. भारत में ज्ञान को एक संसाधन के रूप में विकसित करने हेतु अध्ययन करना एवं सुझाव देना ।

3. मानव संसाधन के क्षेत्र में भारत को एक सशक्त राष्ट्र के रूप में स्थापित करना ।

4. भारत को एक ज्ञानवान देश व एक ज्ञानवान समाज की ओर अग्रसर करना ।

5. भारत को आने वाली वैश्विक चुनौतियों का सामना करने की दृष्टि से सक्षम बनाना ।

6. भारत की मानवपूँजी (युवा पीढ़ी) को सामर्थ्यवान बनाना ।।

7. ज्ञान सम्बन्धी संसाधनों के विकास हेतु आधारिक तंत्र में सुधार की एक कार्य योजना तैयार करना।

8. भारत के विशाल ज्ञान भण्डार का लाभ उठाने के लिये एक कार्य योजना बनाना ।

9. समावेशी उन्नति के केन्द्रीय साधन के रूप में शिक्षा को उच्च प्राथमिकता देना व शिक्षा के प्रति जागरूकता का विकास करना ।

10. पिछड़े व उपेक्षित क्षेत्रों – जैसे कृषि, परम्परागत चिकित्सा, पुस्तकालय, प्राविधिक शिक्षा आदि के नवीनीकरण हेतु प्रयासों की दिशा तय करना ।

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग का गठन

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की स्थापना भारत के प्रधानमंत्री के उच्च स्तरीय सलाहकार निकाय के रूप में की गई थी । आयोग की कल्पना भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह द्वारा निम्न शब्दों में अभिव्यक्त की गई थी – “अब समय आ गया है कि संस्थान निर्माण का दूसरा दौर शुरू किया जाये और शिक्षा अनुसंधान और क्षमता निर्माण के क्षेत्रों में उत्कृष्टता हासिल की जाये” कार्यकाल : ज्ञान आयोग का गठन 13 जून 2005 को किया गया । इस आयोग का कार्यकाल 3 वर्ष रखा गया । प्रारम्भ में 2 अक्टूबर 2008 तक इसका कार्यकाल रखा गया । बाद में इसे 31 मार्च 2009 तक बढ़ा दिया गया । इस प्रकार आयोग का कार्यकाल लगभग 4 वर्ष का रहा। संगठन: ज्ञान आयोग में इसके अध्यक्ष सहित आठ सदस्यों को शामिल किया गया । इसके सभी सदस्य इस प्रकार थे।
डॉ. सैम पित्रोद, डॉ. पी. बलराम डॉ. अशोक गाँगुली डॉ. जयंती घोष डॉ. दीपक नैय्यर डॉ. नंदन नीलेकनी डॉ. अमिताभ मटटू डॉ. सुजाता रामदौराई आयोग की सहायता हेतु कार्यकारी निदेशक तकनीकी कर्मचारी, विशेष कार्य हेतु अधिकारी विशेषज्ञ भी संगठन में सम्मिलित किये गये । प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक अध्यक्ष

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *