भावी भारत में विद्यालय की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये ?

 भावी भारत में विद्यालय की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये ?

एससी.दुबे (S.C.dube) ने भारतीय जनता की महत्काक्षाओं और देश की वास्तविक उपलब्धियों में गंभीर खाई क अस्तित्व, समाज में विविध प्रकार की प्रौद्योगिक व शैक्षिक प्रगतियों के बावजूद बढ़ती हुई संकुचित मनोवृत्ति, भ्रष्टाचार, जड़ता तथा शक्ति सम्पन्नो द्वारा जनसाधारण के शोषण का चित्रण किया है । आद्रे वेते (Andre Betielle) ए.एम.शाह (A.M.Shah) व अन्य कई समाजशास्त्रियों ने भारतीय ग्रामीणों, पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों व जनजातियो शोषण, पिछडाव तथा उनमें अशांति के साथ ही साथ नये सामाजिक व सांस्कृतिक परिवर्तनों द्वारा फैलने वाली सामाजिक शास्त्रियों ने भारतीय राजनैतिक हमारा ध्यान आकर्षित किया है । रजनी कोठारी जैसे राजनीति शास्त्रियों ने भारतीय राजनैतिक जीवन में तेजी से बढ़ते हुए आदर्शो भीड़तंत्र, अनुशासनहीनता, हिंसा व भ्रष्टाचार आदि को इंगित किया है। । विज्ञान शिक्षा व प्रौद्योगिकी में अनेकानेक महान् सफलताओं को पाने पर भी हमारा समाज आज परम्परा और आधुनिकता, तर्क और अंध विश्वास, धर्म निरपेक्षता और धर्मांधता, समृद्धि और बेकारी, उच्च आदर्शों और कुत्सित व्यवहार प्रणालियों व भ्रष्टाचार के विरोधाभासों में उलझा हुआ है ।
ऐसे भारतीय समाज का भविष्य 10-15 या 20 वर्षों में अचानक नहीं बदल सकता । ये गंभीर सामाजिक, सांस्कृतिक आर्थिक और राजनैतिक समस्याएँ और अधिक उग्र होकर हमारे भविष्य को हमारे वर्तमान से कहीं अधिक दुखपूर्ण, विकट और असहनीय बना सकती है । विदेशों की भविष्य की खोजों, उनके अच्छे और बुरे सामाजिक भावों (विशेषकर बुरे प्रभावों) तथा भविष्य की अप्रत्याशित घटनाओं जैसे युद्धों, प्राकृतिक विपदाओं आदि से भारतीय समाज के भविष्य का स्वरूप और भी जटिल विषम और कष्टप्रद हो सकता है | समाजवैज्ञानिकों का चिन्तन तो यही संकेत दे रहा है । दूसरी ओर ऐसे अनेक विचारक भी है जो भारत में राम राज्य क शीघ्र लौट आने, दूध-घी की नदियाँ पुनः बहने तथा भारत द्वारा विश्व को नैतिक, आध्यात्मिकता, शांति, विश्व-बंधुत्व के पाठ पढ़ाने वाले धर्मगुरू बनने की आशाएँ कर रहे है । कुछ वैज्ञानिक यह सोचते है कि भारत में विज्ञान व प्रौद्योगिकी की विदेशों जैसी जबरदस्त प्रगति होगी और हम गरीबी बेकारी सांस्कृतिक पिछडाव आदि समस्याओं का 8-10 वर्षा में ही सदैव के लिए हल लेंगे । आदिशेषैया जैसे अर्थशास्त्री व भविष्यशास्त्री इसके विपरीत यह अनुमान लगा रहे हैं कि 21 वीं शताब्दी के भारत में भी मूलरूप से कृषि-प्रधान अर्थतंत्र ही होगा और जनसंख्या का भयंकर विस्फोट हमारे समाज को बहुत परेशानी की आर्थिक परिस्थितियों में झोंक देगा । बढ़ती हुई महँगाई, कालाधन वर्ग-भेद, शोषण सम्भवतः निकट भविष्य में तो समाप्त नही हो पायेंगे । इतनी सारी सम्भावनाएँ हैं हमारे समाज के भावी स्वरूप के बारे में । अतः हमें कैसा भविष्य चुनना है अथवा बनाना है, उसके बारे में अब गंभीरता से समाज के प्रत्येक व्यक्ति को सोचना आवश्यक है और उसके लिए उपयुक्त तैयारी शुरू करनी है ।। न केवल राजनीतिज्ञों, आयोजकों व प्रशासकों का इस दिशा में गंभीर रूप से सोचना आवश्यक है। अपितु सभी स्तरों की शिक्षा से सम्बद्ध, सभी कार्यकत्र्ताओ को अब इस दिशा में तुरन्त सोचना व कार्य करना आवश्यक हो गया है । वर्तमान शताब्दी के एवं एक दिन एवं एक पल इस प्रकार के चितन के तैयारी में व्यय किया जाना चाहिए, उनको बर्बाद होने देना भावी भारतीय समाज के प्रति किया गया गंभीर अपराध ही माना जायेगा ।

 भावी भारत में विद्यालय

वर्तमान में विद्यालय औपचारिक शिक्षा के ऐसे केन्द्र हैं, जहां बच्चे एक निश्चित समय तक बधे रहते हैं और निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार अध्यापक उनके मस्तिष्क में जानकारी भरने का कार्य करते हैं । इवान इलियन ने “Deschooling Society” तथा रेमर ने School is dead नाम पुस्तकों के माध्यम से भविष्य में विद्यालय विहीन समाज की कल्पना की है। भविष्य में निर्विद्यालयीकरण के स्थान पर निरोप साधन बनेंगे ।
विद्यालय विद्यार्थियों को नई जानकारी देने के माध्यम बनेंगे तथा अभिष्ट गुणों व व्यावहारिक कौशलों का विकास करेंगे । विद्यालय श्यामपट्ट अभियान के अनुरूप सभी आवश्यक उपकरणों से सुसज्जित होंगे । विद्यालयों में परम्परागत कठोरता को छोड़कर व्यावहारिकता, लचीलापन व उपयोगिता लानी होगी ।भविष्य की भारतीय शिक्षा संस्थाएँ
उपर्युक्त विश्लेषण के संदर्भ में हमें यह देखना होगा कि हमारे भविष्य की शिक्षा कैसी हो, हमारी शिक्षा संस्थाएँ कैसी हो हमारे शिक्षक कैसे हों और हम क्या अन्य व्यवस्थाये तैयारियां करें ।
भविष्य के भारत की शिक्षा को सुधारवादी, नव निर्णयकारी, आधुनिक, गतिशील तथा उच्चस्तरीय कुशलताओं को विकसित करने वाली शिक्षा बनाना पड़ेगा । आज की शिक्षा नारेबाजी की शिक्षा है जो थोथे आदर्श, नारों रूपी अफीम मे नशे में जनता को गुमराह रखती है, जो जन साधारण को शोषणकर्ताओ का भौतिक मानसिक और सांस्कृतिक तीनों रूपों से दास बनाए हुए हैं।
जब तक शिक्षा का यह वर्तमान प्रारूप (मॉडल) जिसे “बैंकिंग मॉडल आफ एजूकेशन’ (Banking Model of Education) कहा गया है, नहीं बदला जाता, और उसके स्थान पर आत्मा का झकझोर देने वाली तथा अपनी लड़ाई स्वयं लड़ने की सामर्थ्य उत्पन्न करने वालाआ त्मा के सबलीकरण वाली शिक्षा का प्रारूप (Conscientization model of education), जिसे मैक्सिको के सुप्रसिद्ध देशभक्त व शिक्षाशास्त्री पावलो फ्रेरे (Paolo Friere) ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक (Education of the Oppressed(1973) में प्रस्तुत किया है, नहीं अमल में लाया जाता, भारतीय समा का शोषण और अन्य समस्याओं का अन्त नहीं हो पायेगा ।
आज सम्पूर्ण विश्व में यह स्वीकार किया जा रहा हैं कि बजाय सिखाने-पढ़ाने (teaching) पर ही जोर देने के आवश्यकता इस बात की है कि हर कही सीखने का पर्यावरण (learning environment) तैयार किया जाये जिसमें सीखने वाला स्वंय अपनी प्रेरणाओं से प्रेरित होते हुए तथा विविध प्रकार के शान के अवसर प्रस्तुत कराने वाली संस्थाओं, समितियों व औपचारिक व अनौपचारिक व्यवस्थाओं का लाभ उठाते हुए अपने लक्ष्यों की ओर अपनी गति से बढ़ता जाये ।।

सामाजिक, सांस्कृतिक आर्थिक और राजनैतिक समस्याएँ

विश्वभर में जो महान् आश्चर्यजनक वैज्ञानिक प्रोद्योगिक प्रगतिया हो रही हैं उनकी चुनौतियां भी भारतीय शिक्षा को स्वीकार करनी है | स्पर्धा के इस युग में भविष्य के भारत की शिक्षा को अत्यंत उच्च कोटि का बनना ही पड़ेगा । वरना हम दुनियां के प्रगतिशील देशों से काफी पीछे रह जायेंगे | यदि हमने अपनी शिक्षा संस्थाओं को आगामी 5-7 वर्षों में ही बहुत क्रियात्मक भविष्य चेतना और तर्कपूर्ण सोचविचारों के आधारों पर नहीं सुधारा, तो भारत का भविष्य निःसंदेह भयंकर रूप से धूमिल हो सकता है ।
इस प्रकार की चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करने वाली शिक्षा प्रदान करने वाली संस्थाओं का स्वरूप निम्नानुसार बनाना होगा ।
1. बहुत भारी विशाल पैमाने पर टेलीविजन, वीडियो तथा रेडियो का उपयोग करते हुए हमें | सभी आयु वर्गो व क्षेत्रों के लोगों को शिक्षित करना होगा ।

2. वर्तमान शिक्षा संस्थाओं को चौबीस घंटों, पारियों में चलाकर, हमें अनेक भवनों वसाधनों  का पूर्णतया उपयोग शिक्षा प्रसार क लिए करना होगा ।

3. बजाय जगह जगह पर परम्परागत प्रकार के स्कूल कालेज खोलते रहने के, हमें सीखनेके जाल (Learning Webs) निर्मित करने होंगे । 

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