सैडलर आयोग की नियुक्ति के क्या कारण थे ?

सैडलर आयोग की नियुक्ति के क्या कारण थे ?

5. लखनऊ विश्वविद्यालय – यह विश्वविद्यालय 1920 में स्थापित हुआ । इसका विधान और इसकी व्यवस्था ढाका विश्वविद्यालय के ही अनुरूप बनाई गई, जिसका विशद विवेचन हम आगे करेंगे ।

6. पटना विश्वविद्यालय – यह विश्वविद्यालय 1917 में स्थापित हुआ । इसका अधिकृत क्षेत्र संपूर्ण बिहार और उड़ीसा प्रान्त था । यह विश्वविद्यालय 1904 के विधान के अनुसार उसी ढाँचे पर बनाया गया था | 1904 के विधान के इस अतिक्रमण से स्पष्ट मालूम होता है कि सरकार पर जन-आन्दोलनों का कितना प्रभाव पड़ रहा था ।

7. ढाका विश्वविदयालय – यह विश्वविदयालय 1920 में स्थापित हुआ । यह एक स्वतंत्र, शिक्षात्मक और आवासत्मक संस्था बनी । लोगों का विश्वास है कि इस विश्वविद्यालय का जन्म संकीर्ण जातिगत और स्थानीयदेशभक्ति की भावना से हुआ । दिसम्बर 1911 में जब उत्तर भारत के प्रान्तों की सीमा के पुनर्निधारण की समस्या सामने आई तब पूर्व बंगाल और आसाम के मुसलमान सशंक हो उठे । उन्होनें सोचा कि इस परिवर्तन से हमारी शिक्षा को बहुत बड़ा धक्का लगेगा | अत: जनवरी 1912 में उन्होंने लाई हार्डिंग के पास इसी आशय का एक प्रार्थना पत्र भेजा । लाई हार्डिग ने उन्हें आश्वास दिया और ढाका में एक विश्वविद्यालय का वचन दिया ।


(B) माध्यमिक शिक्षा

विद्यालयों की संख्या डेढ गुणा बढ़ गई तथा विद्यार्थी प्रवेश दो गुना बढ गया । व्यावसायिक पाठ्यक्रम माध्यमिक कक्षाओं में शुरू किये गये । माध्यमिक स्तर पर अंग्रेजी संप्रेषण की मुख्य भाषा थी, जिसको अधिक महत्व दिया जाने लगा । शिक्षकों को अंग्रेजी प्रशिक्षण देने के लिए तेरह विद्यालयों को लिया गया । इतिहास, भूगोल व विज्ञान पर अधिक जोर दिया जाने लगा । मानक विद्यालय खोले गए ।

(C) प्राथमिक स्तर

प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य एवं निशुल्क हो ऐसी लहर संपूर्ण भारत में फैल गई । अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा अधिनियम 1918 बम्बई, 1919 विहार, उड़ीसा, पंजाब, बंगाल तथा 1920 मद्रास केन्द्र के लिए बनाया गया । स्वमूल्यांकन प्रश्न 1. सैडलर आयोग के अन्तर्गत किन नवीन विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई ।

2. माध्यमिक व प्राथमिक शिक्षा में आये परिवर्तन लिखिये ।।

निष्कर्ष

शिक्षा के क्षेत्र में सैडलर आयोग का अवितीय महत्व है । यद्यपि आयोग की नियुक्ति मुख्य रूप से कलकत्ता विश्वविद्यालय की समस्याओं में हस्तक्षेप करने के लिए की गई थी, फिर भी इसकी सिफारिशें संपूर्ण तौर पर भारत में उच्च शिक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण थीं । आयोग की सिफारिशों को सरकार द्वारा स्वीकार किया गया और भारतीय विश्वविद्यालयों में सुधारों और परिवर्तनों का आरम्भ किया गया । इन परिवर्तनों के होने से विश्वविद्यालय केवल परीक्षा लेने वाले संगठन नहीं रह गए थे । वे अब शिक्षण और शोध के केन्द्र बन गए थे और अधिक स्वतंत्र हो गए थे । आयोग ने प्रशासनिक संगठनों का निर्माण किए जाने का सुझाव दिया और ये नए विश्वविद्यालयों के लिए आदर्श थे और इन्होंने विद्यमान विद्यालयों को भी नई रूप रेखा के अनुसार आकार दिया । नए विश्वविद्यालयों का स्वरूप पुराने विश्वविद्यालयों से अधिक बढ़िया था क्योंकि वे सुझाई हुई रूप रेखा पर खड़े हुए थे ।

आयोग की रिपोर्ट जानकारी की एक खान (Mine of Information) है | यह गहरे शैक्षिक महत्व वाला एक अभिलेख है और तीस वर्षों से अधिक समय तक इसने भारत में विश्वविदयालय सम्बन्धी शिक्षा को अत्यधिक प्रभावित किया । इसके बाद आने वाले सभी विश्वविद्यालय सम्बन्धी अधिनियमों ने इस रिपोर्ट में अन्तर्निहित कुछ सिफारिशों को सम्मिलित किया है । सिफारिशों ने संपूर्ण तौर पर शिक्षा को एक नया रंग दिया । मैथ्यू के शब्दों में ‘कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग की रिपोर्ट सुझाव एवं प्रेरणा का एक निरन्तर स्त्रोत रही है । भारतीय शिक्षा के इतिहास में इसके महत्व का हिसाब नहीं लगाया जा सकता ।’

(“The Report of the Calcutta University Commission has been a constant source of suggestion and inspiration. Its significance in the History of Indian Education has been incalculable.”-Mathew)
श्री ए.एन. बसु लिखते है, ‘आयोग की चिरस्थायी और विस्तृत रिपोर्टों में माध्यमिक चरण से विश्वविद्यालय तक भारतीय शिक्षा पद्धति का सबसे विस्तृत और तुलनात्मक अध्ययन Horlofaa 11 (“The monumental and voluminous reports of the Commission contained the most comprehensive and comparative study of the Indian Education system from the secondary stage to the university”A.N. Basu)

यह रिपोर्ट भारत में उच्च शिक्षा की एक महान संदर्भ पुस्तक है । उस समय के बहुत से शिक्षाशास्त्रियों दवारा आयोग की सिफारिशों की अत्यधिक आलोचना की गई । एकात्मक आवासीय शिक्षण (Unitary residential teaching) की स्थापना के विषय में की गई सिफारिशें भारत के वित्तीय संसाधनों के अनुरूप नहीं थी । ऐसे विश्वविद्यालयों के लिए काफी खर्च किए जाने की आवश्यकता थी जिसका सामर्थ्य भारत जैसे पिछड़े देश में नहीं था । इन दोषों के बावजूद आयोग के इरादे सच्चे थे क्यों कि विश्वविदयालयों को अनावश्यक हस्तक्षेप से राहत दिलाने के लिए यह सरकार के प्रभाव पर प्रतिबन्ध लगाना चाहता था ।
। आयोग ने एक महान ऐतिहासिक कार्य पूरा किया । उस समय से यह भारत में उच्च शिक्षा के लिए महान प्रेरणा का स्त्रोत रही है । आयोग की सिफारिशों के समय से सुधार काफी हद तक इसके द्वारा सुझाई गई रूप रेखा के अनुसार किए गए हैं । लेकिन शिक्षकों के प्रशिक्षण, उनके वेतन और उनकी नौकरी की स्थिति से सम्बन्धित समस्याओं का समाधान नहीं हुआ ।

 सार संक्षेप

भारत सरकार ने 14 सितम्बर, 1917 को कलकत्ता विश्वविद्यालय की समस्याओं के अध्ययन हेतु सुझाव पेश करने के लिए लीड्स विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ० माइकल सैडलर की अध्यक्षता में सात सदस्यीय आयोग का गठन ‘सैडलर कमीशन’ के रूप में किया ।
आयोग ने माध्यमिक शिक्षा, कलकत्ता विश्वविद्यालय, भारतीय विश्वविद्यालय एवं उच्च शिक्षा, स्त्री शिक्षा, अध्यापक शिक्षण, प्रौद्योगिक शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा आदि के दोषों का अध्ययन कर उन्हें दूर करने हेतु सुझाव दिए । । आयोग के गठन से विश्वविद्यालयों में सुधार, नवीन विश्वविद्यालयों की स्थापना, प्रौद्योगिक एवं व्यवसायिक कोर्स, माध्यमिक एवं इन्टरमीडिएट शिक्षा बोर्ड, माध्यमिक विद्यालयों में वृद्धि, मातृ-भाषा शिक्षण का माध्यम, छात्र हित से अनेक गुणात्मक व मात्रात्मक सुधार हुए।
सैडलर कमीशन ने कलकत्ता विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली एवं प्राथमिक शिक्षा के नियन्त्रण को हस्तान्तरित किया जाने संबंधी दोषों का भी विश्लेषण किया था ।
| सैडलर कमीशन के गठन से नवीन विश्वविद्यालयों की स्थापना जैसा महत्वपूर्ण परिवर्तन शिक्षा के क्षेत्र में सराहनीय योगदान है ।
आयोग के गठन से शिक्षा के उच्च, माध्यमिक एवं प्राथमिक क्षेत्रों में सुधार परिलक्षित हुए | आयोग की सिफारिशें उच्च शिक्षा के लिए महान प्रेरणा का स्त्रोत रही हैं । आयोग की सिफारिशों के समय से सुधार काफी हद तक इसके द्वारा सुझाई रूपरेखा के अनुसार किए गए। 

मूल्याकंन प्रश्न
1. 2. सैडलर आयोग की सिफारिशें क्या थी? 3. “पूरे तौर पर भारत में विश्वविद्यालय शिक्षा के विकास पर सैडलर आयोग की रिपोर्ट

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