शिक्षा नीति की आश्यकता तथा गठन किस प्रकार किया गया ?

शिक्षा नीति की आश्यकता तथा गठन किस प्रकार किया गया ?

1968 की शिक्षा नीति के अन्त में इन सिद्धान्तों को व्यक्त करने के लिये अधिक पूंजी लगाने व राष्ट्रीय आय के 6 प्रतिशत को शिक्षा के व्यय पर खर्च करने की बात कही, किन्तु 1968 की शिक्षा नीति कार्यरूप में परिणति नहीं हो पायी और शिक्षा नीति का वितीय चरण 1979 में प्रारम्भ हुआ । इस वितीय चरण के मुख्य बिन्दु निम्न थे –

1. प्रत्येक व्यक्ति के लिये शिक्षा के उन्नतशील उद्देश्यों का निर्धारण करना ।

2. शिक्षा को राष्ट्रीय भावना के विकास का माध्यम बनाना ।

3. छात्रों में वैज्ञानिक व नैतिक मूल्यों का विकास करना ।

4. शैक्षिक अवसरों की समानता ।।

5. पत्राचार व प्रौढ़ शिक्षा को बढ़ावा देना ।

6- 14 वर्ष तक के बालक-बालिकाओं को निःशुल्क, सार्वजनिक व अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना।

7. त्रि-भाषा सूत्र को अपनाया जाये । 8. शिक्षा के सभी स्तरों पर क्षेत्रीय भाषाएँ शिक्षा का माध्यम हो ।

9. प्रारम्भिक विद्यालयों में प्रतिदिन 3 घण्टे से अधिक स्कूली शिक्षा दी जायें ।

जनवरी 1985 में भारत सरकार ने नई शिक्षा नीति के निर्धारण का संकल्प लिया । अगस्त- 1985 में ‘शिक्षा की चुनौती दस्तावेज प्रस्तुत हुआ जिस पर देशभर में विचार विमर्श किया गया । शिक्षा नीति का दस्तावेज 9 भागों में विभक्त है :
1. भूमिका 2. सामान्य मान्यताएँ 3. शैक्षिक अवसरों की समानता 4. शैक्षिक प्रक्रिया 5. विभिन्न स्तरों पर शिक्षा का पुनर्गठन 6. तकनीकी एवं प्रबन्ध शिक्षा 7. प्राथमिकता के क्षेत्र 8. संसाधन व पुनरावलोकन
9. भविष्य की शिक्षा योजना

 शिक्षा नीति की आश्यकता तथा गठन

भारत को अब ऐसी शिक्षा नीति का इन्तजार था, जो ने केवल राष्ट्रव्यापी हो, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में अपने ऐसे कीर्तिमान स्थापित कर सके जो शिक्षा की समस्त आवश्यकताओं को पूरा कर सकें । तकनीकी शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, पत्राचार शिक्षा, अनवरत् व सतत शिक्षा, औपचारिक एवं अनौपचारिक शिक्षा आदि पक्षों में गुणवत्ता प्रदान सके । पूर्व में स्थापित शिक्षा नीतियों में डॉ0 राधाकृष्णन की अध्यक्षता में 1948 में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग, डाँ० लक्ष्मण स्वामी मुदालियर की अध्यक्षता में 1953 में माध्यमिक शिक्षा आयोग तथा 1964-66 में कोठारी शिक्षा आयोग ने अपनी अपनी संस्तुतियाँ प्रस्तुत की थी । इनके द्वारा परीक्षा में सुधार तथा बहुउद्देश्यीय माध्यमिक शिक्षा को सर्वोच्च महत्व दिया गया | कोठारी शिक्षा आयोग ने शिक्षा के सामान्य स्वरूप के साथ ही गुणवत्ता पर अधिक जोर दिया ।
20 अप्रेल, 1986 को लोक सभा में प्रस्तुत की गयी शिक्षा नीति के मुख्य उद्देश्य बताये गये

1. व्यवसाय पर आधारित शिक्षा का विकास ।

2. नई तकनीक के अनुसार जनशक्ति को प्रशिक्षित करना ।

3. निरक्षरता के निवारण के लिए प्रयास करना ।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इस नवीन राष्ट्रीय शिक्षा नीति को सुचारू ढंग से लागू करने के लिये एक क्रियान्वयन कार्यक्रम (Programme of Action) भी तैयार किया ।

शिक्षा नीति के मुख्य भाग

पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी ने जनवरी, 1983 में संसद में घोषणा की थी कि देश के लिए नई शिक्षा नीति का निर्माण किया जायेगा | नई शिक्षा नीति के प्रमुख पक्ष थे : शिक्षा की राष्ट्रीय प्रणाली का स्वरूप समानता के लिए शिक्षा, विभिन्न स्तरों पर शैक्षिक पुनर्गठन, तकनीकी तथा प्रबन्ध शिक्षा, शिक्षा प्रणाली का क्रियान्वयन, पाठ्यक्रम निर्माण की प्रक्रिया तथा अभिनवीकरण अध्यापक, शिक्षा का प्रबन्धन, समीक्षा तथा भावी स्वरूप ।।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1988) की विषय सामग्री

नई शिक्षा नीति (1986) में सम्मिलित की गई विषय सामग्री को कुल 12 भागों में विभाजित किया गया । इन भागों में सम्मिलित विषय वस्तु को बिन्दुवार प्रस्तुत किया जा रहा है –

प्रस्तावना
प्रत्येक राष्ट्र अपनी विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण एवं उन्नति के साथ-साथ नई चुनौतियों से निपटने के लिये अपनी शिक्षा प्रणाली को विकसित करता है । आज भारत अपने आर्थिक एवं तकनीकी विकास के ऐसे दौर में पहुंच गया है कि वह अपने उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम लाभ प्राप्त करे तथा परिवर्तन के लाभ सभी वर्गों तक पहुँचाने के प्रयास करे | इस लक्ष्य को प्राप्त करने में शिक्षा उपयुक्त माध्यम है | इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने जनवरी, 1985 में देश में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू करने की घोषणा की ।
मनुष्य राष्ट्र की वह मूल्यवान सम्पदा एवं संसाधन है जो राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । अत: इसका सही दिशा में समुचित विकास आवश्यक है जो उचित शिक्षा से ही सम्भव है । पूर्व में घोषित शिक्षा नीतियाँ भारत के सामाजिक एवं राजनैतिक लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु पूर्ण समर्थ न हो पाने के कारण इस शिक्षा नीति के निर्माण एवं क्रियान्वयन की आवश्यकता अनुभव की गई ।

शिक्षा का सार तथा भूमिका

हमारे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में शिक्षा सभी के लिए आवश्यक है । यह हमारे सर्वांगीण विकास भौतिक एवं आध्यात्मिक के लिए आवश्यक है । शिक्षा संवेदनशीलता एवं प्रत्यक्षीकरण को परिमार्जित करती है जिसके आधारपर राष्ट्रीयता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं मस्तिक और आत्मा की स्वतंत्रता विकसित होती है । इससे हमारे संविधान में स्वीकृत – समाजवाद, धर्म निरपेक्षता एवं प्रजातंत्र जैसे लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता भी मिलती है । शिक्षा मानव को अर्थव्यवस्था के विभिन्न स्तरों पर भी विकसित करती है ।।
| इस प्रकार शिक्षा वर्तमान एवं भविष्य के लिए एक विशिष्ट विनियोग है । यही राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मुख्य सिद्धान्त एवं सार है ।।

शिक्षा की राष्ट्रीय प्रणाली

सम्पूर्ण राष्ट्र में शिक्षा की एक राष्ट्रीय प्रणाली हो । शिक्षा की राष्ट्रीय प्रणाली से तात्पर्य शिक्षा के निश्चित स्तर तक राष्ट्र के सभी छात्र छात्राओं को जाति, वर्ग या लिंग के भेदभाव के बिना तुलनीय गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त हो । इसके लिए समान शिक्षा संरचना पर बल दिया गया है | अब देश के सभी भागों में 10+2+3 की संरचना को स्वीकार कर लिया गया है । इनमें प्रथम 10 वर्षों की शिक्षा को इस प्रकार विभाजित किया गया – प्रथम 5 वर्ष प्राथमिक शिक्षा, अगले 3 वर्ष उच्च प्राथमिक शिक्षा एवं अन्तिम 2 वर्ष माध्यमिक शिक्षा ।।
शिक्षा की राष्ट्रीय प्रणाली, राष्ट्रीय पाठ्यक्रम ढाँचे पर आधारित होगी, जिसमें पाठ्यक्रम का कुछ हिस्सा अनिवार्य (कॉमन कोर) एवं शेष हिस्सा लोचशील (आवश्यकतानुसार) होगा । सभी शैक्षिक कार्यक्रम धर्मनिरपेक्ष मूल्यों पर आधारित होंगे । शिक्षा में विश्व शान्ति एवं अन्तर्राष्ट्रीय सहायता जैसे घटकों को भी सम्मिलित किया जायेगा ।

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