शिक्षण विधियां, निर्देशन एवं मूल्यांकन का वर्णन कीजिये ?

शिक्षण विधियां, निर्देशन एवं मूल्यांकन का वर्णन कीजिये ?

चाहिए। (vii)शिक्षक प्रशिक्षक योग्य एवं अनुभवी हो तथा उनमें से कुछ डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त हो।।

(viii) शिक्षक शिक्षा में गुणात्मक सुधार के लिए राष्ट्रीय व प्रान्तीय स्तर पर उपयुक्त नियंत्रण एवं उत्तरदायी संस्थाओं की स्थापना की जाये ।

इस प्रकार आयोग ने शिक्षक शिक्षा के गुणात्मक सुधार के लिए उपयुक्त योजना निर्माण, पाठ्यक्रम तथा शिक्षण विधियों एवं मूल्यांकन में सुधार, शिक्षण प्रशिक्षण संस्थाओं का अन्य संबंधित संस्थाओं से तालमेल एवं शिक्षण प्रशिक्षण संस्थाओं पर नियंत्रण जैसे सुझाव देकर बेहतर शिक्षक तैयार करने पर बल दिया है ।

नामांकन और मानव शक्ति

आयोग के अनुसार शिक्षा का एक उद्देश्य देश में मानव साधनों का विकास करना भी है। अत: शिक्षा का नियोजन इस प्रकार का होना चाहिए कि राष्ट्र के अधिकाधिक व्यक्तियों को शिक्षा उपलब्ध हो सके और देश के मानव संसाधनों का पूरा पूरा उपयोग हो सके । इस दृष्टि से नामांकन एवं मानव शक्ति के विकास के लिए आयोग ने निम्नलिखित सुझाव दिये :

(i) प्रारम्भिक शिक्षा सभी के लिये निःशुल्क एवं अनिवार्य हो, जबकि उच्च माध्यमिक एवं उच्च स्तर की शिक्षा केवल योग्य एवं इच्छुक व्यक्तियों के लिये हो । इसके लिये आर्थिक सहायता भी दी जाये ।

(i) व्यावसायिक एवं प्राविधिक शिक्षा तथा रोजगारपरक शिक्षा पर बल दिया जाए ।

(iii) निरक्षरता को दूर करने के लिये प्रौढ़ शिक्षा का नियोजन ।

(iv) माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा के लिये जनता की मांग व आवश्यकताओं को आधार बनाया जाये तथा छात्रों की क्षमताओं का सम्पूर्ण विकास करने के लिये इस स्तर पर सुविधाओं का विस्तार किया जाये ।
इस प्रकार आयोग ने प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक स्तर पर अनिवार्य तथा निःशुल्क शिक्षा व्यवस्था के आधार पर सभी के लिये शिक्षा, जबकि उच्च माध्यमिक एवं उच्च स्तर पर केवल योग्य व इच्छुक व्यक्तियों के लिए शिक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराने, उन्हें शिक्षा प्राप्ति के लिए आर्थिक सहायता देने तथा रोजगारपरक शिक्षा देने के सुझाव देकर मानव शक्ति का देश के लिए भरपूर उपयोग की बात कही है ।

शैक्षिक अवसरों की समानता

भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, जहां सभी व्यक्तियों को समाज में उन्नति के बराबर अवसर मिलने का संवैधानिक प्रावधान है । इसी बात को दृष्टिगत रखकर आयोग ने भारत में सभी व्यक्तियों को शैक्षिक अवसरों की समानता (बिना जाति, धर्म, लिंग, वर्ग अथवा अन्य किसी भेदभाव के) मिल सके, इस दृष्टि से निम्नलिखित सुझाव दिये हैं :

(i) प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक स्तर पर सभी को निःशुल्क तथा माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक स्तर पर निम्न आर्थिक स्थिति के योग्य छात्रों को निःशुल्क शिक्षा दी जाये।

(ii) प्राथमिक स्तर पर पाठ्य सामग्री मुफ्त दी जाये तथा उच्च स्तर पर बुक बैंक एवं पुस्तकालयों का विकास किया जाये । योग्य एवं प्रतिभाशाली छात्रों के लिए सभी स्तरों पर छात्रवृत्तियों की व्यवस्था की जाये। छात्रों के लिए आवश्यकतानुरूप छात्रावासों की व्यवस्था की जाये । विकलांग बालकों तथा स्त्री शिक्षा के लिए विशेष प्रयास किये जाये । (vi) पिछड़े वर्गों के बालकों तथा आदिवासी बालकों की शिक्षा के लिये छात्रावास, आश्रम विद्यालयों की स्थापना, छात्रवृत्ति आदि की व्यवस्था की जाये ।

(vii) शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े हुए क्षेत्रों के शैक्षिक विकास के लिये विशेष सुविधाएं एवं प्रयास किए जाने चाहिए ।

इस प्रकार सभी को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए आयोग ने बिना किसी प्रकार के भेदभाव के सभी के लिए शैक्षिक अवसर प्रदान करने एवं जरूरतमन्द तथा पिछड़े वर्गों के लिए आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने के सुझाव दिये हैं ।

विद्यालय शिक्षा प्रसार की समस्याएं

विद्यालयी शिक्षा को तीन भागों में विभक्त किया गया है – पूर्व प्राथमिक शिक्षा, निम्न एवं उच्च प्राथमिक शिक्षा तथा निम्न एवं उच्च माध्यमिक शिक्षा । यद्यपि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत में शिक्षा का प्रसार हुआ है, परन्तु यह स्थिति सन्तोषजनक नहीं कही जा सकती है, इस हेतु आयोग ने निम्नलिखित सुझाव दिये हैं। |

(i) पूर्व प्राथमिक स्तर की शिक्षा के प्रसार हेतु राजकीय शिक्षा संस्थान (State institute of education) की स्थापना करनी चाहिए, साथ ही इस स्तर की शिक्षा को कम खर्चीला बनाना चाहिए । पूर्व प्राथमिक स्तर की शिक्षा में शारीरिक तथा खेल सम्बन्धी क्रियाओं को स्थान देना चाहिए ।

(ii) प्राथमिक स्तर की शिक्षा हर बच्चे को निःशुल्क और अनिवार्य रूप से मिले । इस स्तर पर अपव्यय एवं अवरोधन रोकने के प्रयास करने चाहिए । माध्यमिक शिक्षा के प्रसार के लिए जिला स्तर पर योजना बनानी चाहिए। साथ ही इस स्तर पर आने वाली बाधाओं को दूर करना चाहिए | लड़कियों तथा पिछड़े वर्गों की शिक्षा के विशेष प्रयास करने चाहिए । व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की व्यवस्था की जाये ।।

इस प्रकार शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर शैक्षिक प्रसार के लिए आयोग ने शिक्षा के क्षेत्र में आने वाली बाधाओं को दूर करने हेतु महत्वपूर्ण सुझाव दिये । माध्यमिक स्तर पर आयोग ने बहुउद्देश्यीय विद्यालयों की स्थापना के सुझाव के आधार पर शिक्षा के व्यावसायीकरण की बात रखी ।।

विद्यालयी पाठ्यक्रम

शिक्षा प्रक्रिया के तीन महत्वपूर्ण अंग है – उद्देश्य, पाठ्यक्रम एवं मूल्यांकन । पाठ्यक्रम के माध्यम से ही शिक्षा के निर्धारित लक्ष्य प्राप्त किये जाते हैं । अतः पाठ्यक्रम का निर्धारण बहुत सोच विचारकर, किया जाना चाहिए । आयोग ने पाठ्यक्रम निर्धारण हेतु निम्नलिखित सुझाव दिये हैं –

(i) निम्न प्राथमिक स्तर (Lower Primary level) पर पाठ्यक्रम में भाषा गणित, कार्यानुभव, सृजनात्मक क्रियाएं, स्वास्थ्य शिक्षा तथा समाज सेवा आदि विषयों को स्थान मिलना चाहिए । उच्च प्राथमिक स्तर पर पाठ्यक्रम में नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों की शिक्षा, दो भाषाएं, विज्ञान, गणित, समाज सेवा, सामाजिक अध्ययन, कला तथा शारीरिक शिक्षा
आदि विषयों को सम्मिलित किया जाये ।। निम्न माध्यमिक स्तर पर पाठ्यक्रम में तीन भाषाएं, विज्ञान, गणित, भूगोल, नागरिक शास्त्र, समाज सेवा कार्यानुभव, शारीरिक शिक्षा तथा नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों की शिक्षा को सम्मिलित किया जाये ।।
(iv) । उच्चतर माध्यमिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में निम्न विषयों को सम्मिलित करना चाहिए –
(1) कोई दो भाषा,

(2) निम्न में से कोई तीन विषय-एक अतिरिक्त भाषा, इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, गणित, जीव विज्ञान, गृहविज्ञान तथा भूगर्भ शास्त्र (3) कार्यानुभव एवं समाज सेवा, (4) शारीरिक शिक्षा,

(5) कला अथवा चित्रकला,

(6) नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा आई। त्रिभाषा सूत्र का प्रयोग किया जाये- मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा, हिन्दी अथवा अंग्रेजी तथा एक आधुनिक भारतीय या यूरोपीय भाषा जो उपरोक्त में सम्मिलित न हो । लड़के व लड़कियों के पाठ्यक्रम में अन्तर हो ।
इस प्रकार आयोग ने पाठ्यक्रम पर गंभीरतापूर्वक विचार करके त्रिभाषा सूत्र, शिक्षा को उत्पादकता एवं व्यवसाय से जोड़ने तथा लड़के व लड़कियों के पृथक-पृथक पाठ्यक्रम जैसे महत्वपूर्ण सुझाव दिये ।

 

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