भारतीय विश्वविद्यालय आयोग 1902 की नियुक्ति के क्या कारण थे ?

भारतीय विश्वविद्यालय आयोग 1902 की नियुक्ति के क्या कारण थे ?

4. प्रत्येक विश्वविद्यालय को अपने अध्यापकों को नियुक्त करने का अधिकार दिया जाए।

विश्वविद्यालयों का पुनर्गठन

1. भारतीय परिस्थितियां ऐसी नहीं है कि प्रत्येक विश्वविद्यालय को ‘शिक्षण –
विश्वविद्यालयों (Teaching universities)में बदल दिया जाए | अत: स्नातक पूर्व (under Graduate) शिक्षण का कार्य संबंद्ध कालेजों में और स्नातकोत्तर (post Graduate) शिक्षण का कार्य विश्वविद्यालयों में किया जाए । 

2. विश्वविद्यालयों द्वारा अध्यापकों की नियुक्ति और पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं आदि की व्यवस्था की जाए ।

3. सीनेट के सदस्यों की संख्या कम कर उनकी अवधि 5 वर्ष रखी जाए ।

4. सीनेट के सदस्यों में विश्वविद्यालयों व कॉलेजों के शिक्षकों, प्रसिद्ध विद्वानों और सरकारी अधिकारियों को स्थान दिया जाए ।

मान्यता प्राप्त और संबंद्ध कॉलेज

1. कॉलेजों को मान्यता देने के नियमों में अधिक कड़ाई की जाए ।

2. द्वितीय श्रेणी के कॉलेजों को मान्यता न दी जाए ।

3. प्रत्येक संबंद्ध कॉलेज का प्रबंध एक समिति द्वारा किया जाए । इस समिति द्वारा योग्य अध्यापकों की नियुक्ति और भवन, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, छात्रावास आदि की उचित व्यवस्था की जाए । 4. किसी भी कॉलेज को व्यक्तिगत रूप से परीक्षा लेने व उपाधियां देने का अधिकार न दिया जाए ।

पाठ्यक्रम एवं परीक्षा

1. मेट्रीकुलेशन और स्नातक परीक्षाओं के स्तरों को ऊँचा उठाया जाए ।

2. प्रवेश परीक्षा (Entrance Examination) के लिए अंग्रेजी की पाठ्य पुस्तकें न रखी जाए |

3. बी. ए. का कोर्स 3 वर्ष का कर दिया जाए ।

4. अंग्रेजी के एम.ए. कोर्स में किसी भारतीय या शास्त्रीय (Classical) भाषा को रखा जाए ।

भारतीय भाषाओं का अध्ययन

1. छात्रों को शास्त्रीय भाषाओं (Classical Languages) के बजाए आधुनिक भारतीय भाषाओं का अध्ययन करने की आज्ञा देना उचित नहीं है ।

2. शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन से ही भारतीय भाषाओं की प्रगति हो सकती है ।

3. प्रवेश परीक्षा (Entrance Examination) से ऊपर किसी भी परीक्षा के लिए शास्त्रीय भाषाओं के बजाए भारतीय भाषाओं के अध्ययन की आज्ञा नहीं दी जानी चाहिए ।

4. एम.ए. में भारतीय भाषाओं का अध्ययन किया जा सकता है ।

5. बी.ए. के पाठ्यक्रम में भारतीय भाषा रचना (Vernacular composition) अनिवार्य कर दी जाए।

6. विदयालयों में भारतीय भाषाओं के शिक्षण को ऊँचा उठाया जाए ।

अंग्रेजी की शिक्षा

1. विश्वविद्यालयों में अच्छी अंग्रेजी जानने वाले छात्र तभी हो सकते हैं जब विद्यालयों में अंग्रेजी की अच्छी शिक्षा व्यवस्था हो ।

2. विद्यालयों में अंग्रेजी पढ़ाने के लिए केवल उन अध्यापकों को नियुक्ति की जाए जिनकी मातृभाषा अंग्रेजी हो ।

3. जिन शिक्षकों की मातृभाषा अंग्रेजी नहीं है उनको प्रशिक्षण-विद्यालयों में प्रशिक्षण के लिए भेजा जाए ।

आयोग का मूल्यांकन

आयोग के सामने दो मुख्य समस्याएँ थी
1. विश्वविद्यालय के ऐसे संगठन को निश्चित करना, जिसको भारत में विकसित किया जा सके।

2. ऐसे सुझाव देना, जिसको कुछ समय तक अपनाकर अंतिम लक्ष्य तक पहुंचा सके । आयोग ने इन दोनों में से किसी भी समस्या पर विचार नहीं किया । यह विश्वविद्यालय-शिक्षा की प्रचलित प्रणाली को पुनर्संगठित करके केवल शक्तिशाली बनाना चाहता था । उसने इस बात पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया कि कालेजों को विश्वविदयालयों से संबद्ध करने की विधि में किसी प्रकार का परिवर्तन किया जाना चाहिए या नहीं ।
आयोग ने भारतीय भाषाओं का बहुत अधिक अहित किया और उसके विकास पर रोक लगा दी | उसने कहा कि स्कूलों से ही अंग्रेजी की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाए | इसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय जनता ने आयोग का डटकर विरोध किया | बावजूद इसके कर्जन सरकार ने आयोग की सिफारिशों के आधार पर ‘भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम’ (Indian University Act) तैयार किया ।

सारांश

1899 में लार्ड कर्जन भारत का वाइसराय होकर आया तथा भारतीय विश्वविद्यालयों में सुधार किये जाने की आवश्यकता पर बल दिया । इसी के परिणामस्वरूप कर्जन ने 27 जनवरी 1902 को भारतीय विश्वविद्यालय आयोग की नियुक्ति की ।।
। आयोग ने मुख्य रूप से विश्वविद्यालयों को पुनर्गठन, मान्यता प्राप्त और संबद्ध कॉलेज, पाठ्यक्रम व शिक्षा, भारतीय भाषाओं के अध्ययन, अंग्रेजी की शिक्षा आदि विषयों पर सिफारिशें व सुझाव दिये । आयोग के द्वारा भारतीय भाषाओं का अहित किये जाने, अंग्रेजी की शिक्षा पर विशेष बल दिये जाने, विश्वविद्यालय शिक्षा के प्रचार प्रसार के प्रति विरोध प्रगट किये जाने के कारण भारतीयों ने इसका विरोध किया परंतु वे शोर मचा कर चुप हो गये ।

मूल्यांकन प्रश्न

2. भारतीय विश्वविद्यालय आयोग के कार्यक्षेत्र का उल्लेख कीजिए ।

3. विश्वविद्यालयों के पुनसंर्गठन के संबंध में आयोग के क्या सुझाव थे?

4. आयोग ने भारतीय भाषाओं के अध्ययन के संबंध में जो सुझाव दिये हैं उनमें से किसी दो की व्याख्या कीजिये । ।

9.10 संदर्भ ग्रंथ
1. पाठक, पी.डी. – भारतीय शिक्षा और उसकी समस्याएँ, विनोद पुस्तक मंदिर, आगरा 2. Pandey Ram Shakal – Document of Modern Education in India, R.
Lall Book Depot, Meerut 

इकाई 10
हर्टाग समिति
(Hartog Committee) इकाई की संरचना 10.0 उद्देश्य 10.1 नियुक्ति की पृष्ठभूमि 10.2 प्राथमिक शिक्षा 10.3 माध्यमिक शिक्षा 10.4 विश्वविद्यालयी शिक्षा 10.5 स्त्री शिक्षा 10.6 सारांश 10.7 सन्दर्भ ग्रंथ 10.0 उद्देश्य
इस इकाई के अध्ययन के पश्चात् आप – • हर्टाग समिति की नियुक्ति की पृष्ठभूमि से अवगत हो सकेगें । • हर्टाग समिति के गठन की आवश्यकता को बता सकेंगे । • प्राथमिक शिक्षा से सम्बन्धित समस्याओं का निरूपण कर सकेंगे |
माध्यमिक शिक्षा के लिए प्राथमिकताओं का विश्लेषण कर सकेंगे । • माध्यमिक शिक्षा के लिये सुझाव दे सकेंगे ।
• विश्वविदयालय शिक्षा के विस्तार का मूल्यांकन कर सकेंगे । 10.1 नियुक्ति की पृष्ठभूमि
भारतीयों ने 1917 में शिक्षा के महत्व को स्वीकार करते हुए अपने बच्चों को विद्यालयों में भेजना प्रारम्भ किया । किन्तु उसके बाद उन्हें गम्भीर स्थिति का सामना करना पड़ा जिससे उन्हें भारी धक्का लगा । प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त हो गया और वस्तुओं की कीमतें आसमान छूने लगी । देश प्लेग एवं संक्रामक ज्वर से तड़प रहा था । इस तरह की स्थिति से शिक्षा के क्षेत्र में भारी परिवर्तन आया । 1917 में भारत राज्य के सचिव लाई माण्टेग्यू तथा भारत के गवर्नर जनरल चेम्सफोर्ड दोनों ने सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया और माण्टेग्यू चेम्सफोर्ड के संयुक्त नाम से रिपोर्ट प्रस्तुत की । जिसमें प्रशासनिक मशीनरी में सुधार के लिए सुझाव दिये । ब्रिटिश पार्लियामेंट में उनके द्वारा दी गई सभी सिफारिशों को स्वीकार कर लिया गया | माण्टेग्यू चेम्सफोर्ड के आधार पर 1921 में दवेध शासन या दो व्यक्तियों से शासित राज्य की स्थापना कर दी गई । इस व्यवस्था के अन्तर्गत प्रान्तों के विषयों को दो भागों में बांटा गया 1) संरक्षित (Reserved) तथा 2) हस्तान्तरित (Transferred) ।

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