प्राचीन कालीन शिक्षा की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं

प्राचीन कालीन शिक्षा की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं

मुस्लिम काल में व्यावसायिक शिक्षा जैसे ललित कला, हस्तकला, वास्तुकला तथा सैनिक शिक्षा आदि का भी विकास हुआ था । मुस्लिम काल में औपचारिक शिक्षा प्रणाली का विकास नहीं हुआ था, मौखिक प्रश्नों के उत्तर में अध्यापक की संतुष्टि ही शिक्षा की पूर्णता को दर्शाती थी । स्त्री शिक्षा केवल अमीर वर्ग एवं राजघरानों की स्त्रियों के लिए ही सुलभ थी । कट्टरपंथी विचारधारा, लोक भाषाओं की उपेक्षा, कठोर शारीरिक दण्ड आदि मुस्लिम शिक्षा की मुख्य कमियाँ हैं । वर्तमान काल में मुस्लिम शिक्षा द्वारा प्रदत्त कक्षा न्याय की प्रणाली तथा धार्मिक एवं लौकिक शिक्षा का समन्वय शिक्षा की समस्याओं को दूर करने तथा उसे प्रभावशाली बनाने में सार्थक हो सकता है ।।

शब्दावली उपनयन संस्कार – शिक्षा का प्रारम्भ (गुरू के समीप ले जाना) ।

समावर्तन संस्कार – शिक्षा प्राप्त करके वापस घर लौटना ।। शास्त्रार्थ
– शास्त्रों पर आधारित वाद-विवाद । विस्मिल्लाह रस्म – अल्लाह के नाम पर (शिक्षा प्रारम्भ) । मकतब
– प्राथमिक शिक्षा का केन्द्र ।।
– उच्च शिक्षा का केन्द्र ।।

मूल्यांकन प्रश्न

2. प्राचीन काल में गुरू शिष्य सम्बन्धों का विवरण दीजिये । आज के युग में उनकी क्या प्रासंगिकता है?

3. प्राचीन भारतीय शिक्षा के उद्देश्यों की समालोचना कीजिये?

4. प्राचीन कालीन शिक्षण विधियाँ कौन सी हैं ‘ इन पर प्रकाश डालिये?

5. श्रवण, मनन, निदिध्यासन का क्या अर्थ है? वर्तमान युग में इन विधियों की क्या उपादेयता है?

6. प्राचीन कालीन शिक्षा का पाठ्यक्रम क्या था? इनमें किन-किन क्रियाओं पर बल दिया गया? आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली के विकास में प्राचीन कालीन शिक्षा का क्या
योगदान है?

7. मध्यकालीन शिक्षण संस्थाओं के बारे में सविस्तार वर्णन कीजिये ।

8. मध्यकालीन शिक्षा में गुरू शिष्य सम्बन्ध कैसे थे? 9. मध्यकाल में स्त्री शिक्षा की क्या स्थिति थी?

10. प्राचीन कालीन शिक्षा तथा मुस्लिम कालीन शिक्षा का तुलनात्मक विवरण दीजिये ।।

सन्दर्भ ग्रन्थ
1. पाण्डेय राम शक्ल : भारतीय शिक्षा की समस्याएँ, विनोद पुस्तक मंदिर, आगरा । 2. मलैया, विदयावती : भारतीय शिक्षा की समस्याएँ एवं प्रवत्तियाँ, मैकमिलन कम्पनी
ऑफ इंडिया, दिल्ली । 3. मुखर्जी, एस0 एन0 : एजुकेशन इन इण्डिया, टुडे एण्ड टुमारो, आचार्य बुक डिपो,
बड़ौदा । 4. सैयेदेन, के0 जी0 : साइंस ऑफ एजूकेशन, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली । 5. कबीर, हुमायूँ : स्वतन्त्र भारत में शिक्षा, राजपाल एण्ड सन्स, दिल्ली । 6. चौबे, सरयू प्रसाद : भारत में शिक्षा का विकास, सेत्रल बुक डिपो, इलाहाबाद । 7. अग्रवाल, जे0 सी0 : लैण्डमार्क्स इन दा हिस्ट्री ऑफ मार्डन इंडियन एजूकेशन, वाणी
बुक्स, दिल्ली। 8. ओड, एल0 के0 : शिक्षा के नूतन आयाम, राजस्थान हिन्दी नथ अकादमी, जयपुर।

इकाई 6 शिक्षा के राष्ट्रीय लक्ष्य (National Aims of Education)

इकाई की रूपरेखा 6.0 उद्देश्य । 6.1 प्रस्तावना
कोठारी आयोग के अनुसार शिक्षा के राष्ट्रीय लक्ष्य 6.2.1 शिक्षा द्वारा उत्पादन में वृद्धि 6.2.2 शिक्षा द्वारा सामाजिक और राष्ट्रीय एकता का विकास 6.2.3 शिक्षा द्वारा प्रजातंत्र की सुदृढता 6.2.4 शिक्षा द्वारा आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में तीव्रता 6.2.5 शिक्षा द्वारा सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक मान्यताओं का विकास और चरित्र निर्माण लोकतांत्रिक भारत में वर्तमान शिक्षा के राष्ट्रीय लक्ष्य 6.3.1 स्वतंत्रता का संरक्षण 6.3.2 समानता की प्राप्ति 6.3.3 बन्धुत्व का विकास 6.3.4 समाजवाद की स्थापना 6.3.5 पंथनिरपेक्षता की प्राप्ति 6.3.6 लोकतांत्रिक दृष्टि का विकास 6.3.7 राष्ट्रीय एकता का विकास 6.3.8 भावनात्मक एकता का विकास 6.3.9 राष्ट्रीय विकास 6.3.10 कुशल नेतृत्व का विकास 6.3.11 राष्ट्रीय जीवन में शुचिता का विकास 6.3.12 राष्ट्रीय चेतना का विकास 6.3.13 राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग और संरक्षण 6.3.14 जनसंख्या नियंत्रण व मानव संसाधन का नियोजन 6.3.15 पर्यावरण संचेतना का विकास 6.3.16 समान आर्थिक विकास 6.4 शिक्षा के राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति में बाधक तत्व 6.5 सारांश 6.6 मूल्यांकन प्रश्न 6.7 सन्दर्भ ग्रन्थ
उद्देश्य
इस इकाई के अध्ययन के पश्चात् आप –

• छात्र शिक्षा के लक्ष्यों से अवगत हो सकेंगे ।

• छात्रों में शिक्षा के राष्ट्रीय लक्ष्यों का संप्रत्यय विकसित हो सकेगा ।।

• छात्र कोठारी कमीशन के अनुसार निर्धारित शिक्षा के लक्ष्यों का अधिगम कर सकेंगे ।

• वर्तमान लोकतांत्रिक भारत के राष्ट्रीय लक्ष्यों से अवगत हो सकेंगे।

• वर्तमान लोकतांत्रिक भारत के राष्ट्रीय शैक्षिक लक्ष्यों को जान सकेंगे ।
लोकतांत्रिक भारत के राष्ट्रीय लक्ष्यों का वर्गीकरण कर सकेंगे ।

• लोकतांत्रिक भारत की राष्ट्रीय आवश्यकता के अनुरूप स्वयं का विकास कर सकेंगे ।

 प्रस्तावना

| 15 अगस्त सन् 1947 को देश की राजनैतिक स्वतंत्रता के साथ यह निश्चित कर लिया गया था कि भारत एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना करेगा । जिसमें स्वतंत्रता समानता और बन्धुत्व के आधार पर भारतीय जन स्वयं को समवेत करेंगे । यद्यपि भारत में गणतंत्र नवीन संप्रत्यय नहीं था प्राचीन भारत में गणतंत्रों का अस्तित्व था जहाँ सदन या सभा जैसी व्यवस्था द्वारा लोक अपने राजनैतिक निर्णय लेते थे । परन्तु आधुनिक लोकतन्त्र का जन्म रुसो के शोसल कांट्रेक्ट” से निकले महावाक्य “मनुष्य स्वतंत्र रूप से जन्म लेता है परन्तु वह सर्वत्र दासता की बेड़ियों से जकड़ा रहता है,” से हुआ है । रुसों और वालेटेयर के विचार फ्रांस की राज क्रान्ति के कारण बने । यहीं से स्वतंत्रता, समानता और बन्दुत्व के आधार मानने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था का जन्म हुआ । संयुक्त राज्य अमेरिका ने सर्वप्रथम लोकतन्त्र को प्रभावी ढंग से राजनैतिक क्षेत्र में लागू किया । जहां अब्राहन लिंकन ने “जनता के लिए जनता की सरकार” के सिद्धान्त को मूर्त रूप प्रदान किया गया । भारतीय प्रजातंत्र अपेक्षाकृत नया होते हुए भी विशाल लोकतंत्र की श्रेणी में आता है | यहाँ एक अरब से अधिक लोगों के पास प्रत्यक्ष मताधिकार है । यहां के मतदाताओं का निर्णय स्थापित सरकारों को अपना बोरिया बिस्तर समेटने को आश्चर्यजनक रुप से बाध्य करता है | भारतीय जनतंत्र की अक्षुणता और इसकी कमियों के समाहार के लिए राष्ट्रीय उद्देश्यों की स्थापना आवश्यक होती है । जिसकी प्राप्ति के लिए राष्ट्र शिक्षा संस्था का संगठन करता है ।।
| भारत के राष्ट्रीय लक्ष्यों को संविधान की उद्देशिका द्वारा स्पष्ट किया गया है, जो भारतीय सभ्यता संस्कृति के मूल उद्देश्य के साथ-साथ राष्ट्र की आधुनिक आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है । इन्हीं राष्ट्रीय उद्देश्यों के द्वारा शिक्षा के राष्ट्रीय लक्ष्यों का निर्माण होता है ।
संविधान की उद्देशिका :-“हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथ-निर्पेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय दिलाने के लिए तथा विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म एवं उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता सुनिश्चित करने वाली

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